स्मृति ईरानी : एक अध्याय जिसका निष्कर्ष शेष है
मनमीत सोनी 
यह 2001 – 02 की बात है। मैं छह-सात वर्ष का था। किराए के घर में रहने वाला मध्यम-वर्गीय बच्चा। यह बच्चा एक चुप्पा बच्चा था। यह अपने मकान मालिक के घर में देर रात तक बैठा रहता था। मकान मालिक के घर के सारे लोग रात को स्टार प्लस लगाते। वे मिल-जुल कर “कहानी घर घर की” और “क्योंकि सास भी कभी बहू थी” देखते। उस बच्चे ने “तुलसी” को पहली बार वहीं देखा था। और उस बच्चे के मन में हमेशा के लिए एक भारतीय स्त्री की सु – स्पष्ट छाप पड़ गई थी।
मैं, स्मृति ईरानी उर्फ़ स्मृति ज़ुबिन ईरानी को तब से जानता हूँ। मैं उस भारतीय स्त्री के प्रेम में तब से आज तक डूबा हुआ हूँ। और यह आश्चर्य की बात इसलिए नहीं है कि मैं एक भारतीय हूँ। और किसी भारतीय का परदे के नायक – नायिका से कैसा लगाव हो जाता है, यह तो जग – जाहिर है। स्मृति ईरानी आज से नहीं बल्कि पच्चीस – छब्बीस वर्षों से भाजपा से जुड़ी है। नई पीढ़ी को लगता है कि वे नरेन्द्र मोदी की खोज हैं। नहीं, 2003 में वे भाजपा से जुड़ गई थीं। 2004 में उन्होंने चांदनी चौक से विधानसभा चुनाव लड़ा। लेकिन वे हार गई थीं। बाद में वे भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य रहीं। फिर भारतीय महिला मोर्चा की अध्यक्ष। फिर गुजरात से राज्यसभा सदस्य। फिर 2014 में मानव संसाधन विकास मंत्री। अक्सर कहा जाता है कि नरेन्द्र मोदी ने स्मृति ईरानी में क्या देखा। लेकिन सच बात तो यह है कि स्मृति का संघर्ष कोई कमतर संघर्ष नहीं रहा। वह लड़की जो एयर होस्टेस बनना चाहती थी (अनिच्छा से), उसने इंडस्ट्री के कड़े कोस पार किये। अपने दम पर जगह बनाई। लगभग एक दशक तक भारतीय महिलाओं को स्वयं पर मुग्ध रखा। इसके साथ उसने राजनीति की आड़ी – तिरछी राहों को पार किया और केंद्रीय मन्त्रीमंडल तक पहुंची।
मुझे स्मृति ईरानी की राजनीतिक यात्रा से इतना लेना देना नहीं। यह तो तथ्य की बात है कि वे 2014 में अमेठी से हारी। फिर 2019 में जीती। फिर 2024 में फिर हार गई। और, अब वे लगभग नेपथ्य में चली गई हैं। लेकिन स्मृति ईरानी के मुख मंडल पर एक ज़बरदस्त आकर्षण है। उनकी वक्तृता, उनकी मेधा, उनकी स्मृति और उनकी भाषा बहुत अच्छी है। मुझे लगता है कि केंद्रीय मन्त्रीमंडल से दूर होने के बाद भी देश का मीडिया उन्हें ढूंढता है और “कवर” करना चाहता है। यह रहस्य ही है कि अपने समय की मानव संसाधन मंत्री, प्रधानमंत्री की चहेती और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के इतनी निकट रहने के बावजूद स्मृति ईरानी के भाग्य में यह अनचाही गुमनामी क्यों आई? कहने वाले कहते हैं कि वे अब भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की प्रिय नहीं रही। कोई कहता है कि उनमें अहंकार आ गया। कोई कहता है कि इसमें भी भाजपा का एक रहस्य है। एक रणनीतिक सूझबूझ है। जो भी हो, वह चेहरा इन दिनों टीवी से ग़ायब है। लो प्रोफाइल है। लेकिन मेरा मन कहता है, वह लौटेगा। क्योंकि लौटे बिना इस अध्याय का अंत नहीं हो सकता।
2024 में डेढ़ लाख से अधिक वोटों से हारने वाली स्मृति ईरानी इस समय क्या सोच रही होंगी? जिस व्यक्ति पर चौबीस घंटे कैमरों की रौशनी पड़ती थी, क्या वह एकांत के अँधेरे को इतनी सरलता से अपने वक्ष पर झेल सकता है? क्या बहुत लोकप्रिय मनुष्य अपनी ही लोकप्रियता को पीछे मुड़कर देखने पर एक काली अँधेरी खोह पाता है? स्मृति ईरानी के बारे में सोचते हुए मैं राजेश खन्ना तक जाता हूँ। लेकिन स्मृति ईरानी राजेश खन्ना नहीं हैं। वे 2004 में हार चुकी हैं। वे 2014 में हार चुकी हैं। वे 2024 में हार चुकी हैं। उन्होंने ख़ुद रजत शर्मा को यह कहा था : मेरा भाग्य मेरी जीत से अधिक मेरी हारों ने लिखा है। तो क्या स्मृति ईरानी भीतर ही भीतर तैयारी कर रही हैं। जिस नरेन्द्र मोदी के खिलाफ़ उन्होंने अपने प्रारम्भिक राजनीतिक जीवन में भूख-हड़ताल की धमकी दी थी, बाद में उसी नरेन्द्र मोदी – शासित – गुजरात से वे राज्यसभा की सांसद बनी। तो क्या वे नरेन्द्र मोदी के सत्ता के बाहर होने का इंतज़ार कर रही हैं? क्या वे सही समय की प्रतीक्षा कर रही हैं? क्या वे भारतीय राजनीति में मुद्दों की बाढ़ के ठहरने और गाद के जमने के बाद नई ज़मीन तैयार होने के बाद का कुछ सोच रही हैं?
लेकिन मैं स्मृति ईरानी के बारे में इतना क्यों सोच रहा हूँ? शायद इसलिए कि जब भाजपा हिंदुत्व के मुद्दे पर इतनी प्रखर नहीं थीं (कुछ कुछ सुस्ताने लगी थी), तब स्मृति ईरानी ही थीं जो हिंदुत्व के मुद्दे पर सबसे प्रखर थीं। यह केंद्र में मोदी के उभार से पहले की बात है। यह उत्तर प्रदेश में योगी के झंडारोहण से पहले की बात है। यह तब की बात है जब पार्टी में सुषमा स्वराज, प्रमोद महाजन, अरुण जेटली और वेंकय्या नायडू जैसी एक “B” टीम हुआ करती थी। इस टीम का निर्माण अटल-युग की छत्रछाया में हुआ था। इसी टीम में एक दरार बनाते हुए स्मृति ईरानी आगे आई थीं और हिंदुत्व की राजनीति को लेकर स्मृति के मन में कोई संदेह नहीं था।
क्या यह राजनीति की विडंबना है कि 2002 के बाद गुजरात में मोदी और केंद्र में स्मृति ईरानी का “हिंदुत्व” स्वर एक ही समय रंग पकड़ता है? क्या मैं यह कहने का साहस कर सकता हूँ कि हमारे तब के गुजरात के मुख्यमंत्री और हमारी तब की तुलसी के बीच किसी प्रकार की राजनीतिक स्पर्धा भी रही होगी? ऐसे प्रश्नों को हवा में उछाल कर दूर भाग जाना चाहिए! लेकिन मुझे स्मृति ईरानी अपनी ओर खींचती ज़रूर हैं। वे कंगना राणावत की तरह अस्थिर नहीं हैं। वे योगीजी की तरह वेध्य नहीं हैं। वे हेमंता विस्वा सरमा की तरह अनगाइडेड मिसाइल नहीं हैं। वे तेज़ हैं। चालाक हैं। सभ्य हैं। आकर्षक हैं। और भाषा के स्तर पर भाजपा के अधिकतर नेताओं से कहीं आगे हैं। पचास बरस की हो चुकी स्मृति का राजनीतिक कैरियर ख़त्म नहीं हुआ है। अभी तो छप्पन वर्ष का राजकुमार दस जनपथ के पालने में टांगें मार रहा है। राजनीति बहुत “अनप्रेडेक्टिबल” होती है। आप लाख कह लीजिये कि स्मृति केंद्रीय स्तर पर कामयाब नहीं रहीं। लेकिन आज की भाजपा के मंत्रियों से वे कहीं बेहतर थी। शायद आप भी यह स्वीकार करेंगे कि 2014 से 2022 के आसपास तक की भाजपा ही सच्ची भाजपा थी। सीटें कम होने के साथ ही भाजपा की आक्रामक राजनीति कमज़ोर पड़ गई है। ख़ुद मोदीजी ने कुछ बेहद भरोसेमंद साथी खो दिए हैं। स्मृति ईरानी एक रहस्य हैं। काली फ्रेम के मोटे चश्मे से झाँकती हुई आँखों में अब भी शरारत बाक़ी है। देखते हैं कि उनका क्या होता है। या यह भी, कि वे भाजपा के साथ क्या सुलूक करती हैं? एक खार खाई हुई स्त्री से रहस्यमयी कुछ भी नहीं। राजनीति की क्रूरता और बदलते रहने वाले कांटे के बारे में कौन पागल निश्चित होकर कुछ कह सका है? क्या पता कि जो टीवी के परदे पर इस देश की सबसे चहेती बहू थी, वह आने वाले किसी दशक में इस देश की प्रधानमंत्री के रूप में सचमुच की चहेती बन जाए? क्या पता कि दस जनपथ के पालने में झूलते हुए एक बालक का सपना इसलिए सपना रह जाए कि जवानी मोदी जी खा गए और बुढ़ापे में स्मृति ईरानी ने चैन की सांस नहीं लेने दी! क्या पता?






