हिन्दू दर्शन भेद व तत्व
सतीश शर्मा 
हिंदू दर्शन वह जीवन पद्धति है जो वेदों की सर्वोच्चता, कर्मफल, पुनर्जन्म और मोक्ष (मुक्ति) के सिद्धांतों पर आधारित है। इसके मुख्य गुणों में दार्शनिक स्वतंत्रता, विविधता, आत्मा की अमरता, और सत्व, रजस व तमस गुणों की तिकड़ी के माध्यम से संतुलन शामिल है। यह दर्शन दुःख से मुक्ति, योग और नैतिक जीवन को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। हिन्दू दर्शन मुख्य रूप से वेदों की प्रामाणिकता को मानने वाले षड्दर्शन में विभाजित है। न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत। ये दर्शन कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष के सिद्धांतों पर आधारित हैं, जिनका लक्ष्य आत्मा और ब्रह्म के संबंधों को समझकर जीवन का परम उद्देश्य प्राप्त करना है।
हिन्दू दर्शन के मुख्य प्रकार (षड्दर्शन) है
न्याय दर्शन (महर्षि गौतम) – तर्कशास्त्र और प्रमाण (ज्ञान के साधन) पर केंद्रित है। न्याय दर्शन की मुख्य बाते,इसके संस्थापक है महर्षि गौतम जिन्हें अक्षपाद भी कहा जाता है। मूल ग्रंथ है न्याय सूत्र (5 अध्याय, 10 आह्निक, 538 सूत्र)। इसका उदेश्य है तर्क और प्रमाण द्वारा सत्य का ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त करना। इसमे मुख्य सोलह पदार्थ न्याय दर्शन में ज्ञान के लिए हैं। यह प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द को यथार्थ ज्ञान के साधन मानता है। गौतम के अनुसार, ईश्वर सृष्टि के रचयिता हैं और कर्मों के अनुसार सुख-दुःख का विधान करते हैं।अन्य नाम,इसे तर्कशास्त्र, प्रमाणशास्त्र या आन्वीक्षिकी भी कहा जाता है। यह दर्शन यह मानता है कि तत्वज्ञान के माध्यम से ही मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
वैशेषिक दर्शन (महर्षि कणाद) – भौतिक तत्वों (परमाणुवाद) का सूक्ष्म विश्लेषण करता है।वैशेषिक दर्शन, महर्षि कणाद द्वारा प्रतिपादित एक प्राचीन भारतीय दार्शनिक प्रणाली है, जो यथार्थवाद और परमाणुवाद पर आधारित है। यह सृष्टि की संरचना को परमाणुओं से निर्मित मानती है और पदार्थों का वर्गीकरण 6 या 7 श्रेणियों (द्रव्य, गुण, कर्म आदि) में करती है, जिसका उद्देश्य ज्ञान के द्वारा मोक्ष प्राप्त करना है।
वैशेषिक दर्शन के मुख्य सिद्धांत और मुख्य तत्व,इसके संस्थापक है महर्षि कणाद, जिन्हें ‘कणभुक्’ (कण खाने वाला) के नाम से भी जाना जाता है। परमाणु सिद्धांत, कणाद ने बताया कि पदार्थ की सबसे छोटी इकाई ‘अणु’ (परमाणु) है, जो शाश्वत, अविभाज्य और अविनाशी है। उन्होंने 2500 वर्ष पहले ही स्पष्ट किया कि संसार के सभी भौतिक पदार्थ परमाणुओं से बने हैं।पदार्थ वर्गीकरण,वैशेषिक दर्शन के अनुसार, सृष्टि के सभी अनुभवजन्य पदार्थों को 6 श्रेणियों (पदार्थ) में विभाजित किया गया है: द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, और समवाय। बाद में ‘अभाव’ को 7वीं श्रेणी के रूप में जोड़ा गया।वैज्ञानिक दृष्टिकोण, इस दर्शन में द्रव्यों के नीचे गिरने (गुरुत्वाकर्षण) और रासायनिक परिवर्तन (ऊष्मा के कारण आम का पकना या मिट्टी के बर्तनों का रंग बदलना) की चर्चा की गई है। मोक्ष,पदार्थों के यथार्थ ज्ञान से आत्मा को दु:ख से मुक्ति (मोक्ष) मिलती है।वैशेषिक सूत्र,यह दर्शन ‘वैशेषिक सूत्र’ नामक ग्रंथ पर आधारित है, जिसमें 10 अध्याय और 370 सूत्र हैं। वैशेषिक दर्शन को सांख्य और वेदांत के अतिरिक्त अन्य सभी भारतीय दर्शनों का पूर्ववर्ती माना जाता है।
सांख्य दर्शन (महर्षि कपिल) – यह पुरुष (चेतना) और प्रकृति के द्वैत पर आधारित है।सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष और प्रकृति का वर्णन:
पुरुष चैतन्य स्वरूप: पुरुष शुद्ध चेतना है, जो ज्ञान का विषय नहीं, बल्कि स्वयं प्रकाश है।निष्क्रिय और निर्गुण: पुरुष अकर्ता (निष्क्रिय) है, यह सत्-रज-तम तीनों गुणों से रहित (त्रिगुणातीत) है। साक्षी और असंग: पुरुष उदासीन साक्षी है, जो सुख-दुःख या सांसारिक विकारों से अप्रभावित रहता है।अनेकत्व और नित्य: सांख्य दर्शन के अनुसार पुरुष अनेक (असंख्य) हैं, शाश्वत और अविनाशी हैं।द्रष्टा: पुरुष केवल ‘देखने वाला’ या भोक्ता है।
प्रकृति,जड़ और सक्रिय: प्रकृति अचेतन (जड़) है, लेकिन सृष्टि निर्माण में सक्रिय (परिणामी) है। त्रिगुणात्मक: यह सत् (प्रकाश), रज (क्रिया), और तम (अंधकार) गुणों का संतुलन है। सृष्टि का कारण: प्रलयकाल में समस्त पदार्थ प्रकृति में लीन हो जाते हैं और सृष्टिकाल में इससे 23 अन्य तत्व (महत्, अहंकार, इंद्रियां, पंच महाभूत) उत्पन्न होते हैं। भोग्या: यह पुरुष के भोग और अपवर्ग (मुक्ति) के लिए साधन उपलब्ध कराती है।
पुरुष और प्रकृति का संबंध अंधे और लंगड़े जैसा माना जाता है। प्रकृति सक्रिय है लेकिन अचेतन है, पुरुष चेतन है लेकिन निष्क्रिय है। पुरुष के सान्निध्य में प्रकृति सृष्टि का निर्माण करती है, जिसे पुरुष अनुभव करता है।
योग दर्शन – मानसिक नियंत्रण और आध्यात्मिक अनुभव के लिए अभ्यास पर जोर देता है।पतंजलि योग दर्शन (योगसूत्र) महर्षि पतंजलि द्वारा रचित योग का मूल आधारभूत ग्रंथ है, जिसमें १९५-१९६ सूत्रों के माध्यम से मन को नियंत्रित कर समाधि (कैवल्य) प्राप्त करने का मार्ग बताया गया है। यह अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) के माध्यम से चित्त की वृत्तियों के निरोध पर जोर देता है। इसका मूलभूत सिद्धांत: “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” (चित्त की वृत्तियों को रोकना ही योग है)।अष्टांग योग यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वरप्रणिधान), आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, और समाधि।
इसके चार पाद (अध्याय) है समाधि पाद (51 सूत्र), योग का अर्थ, चित्त वृत्ति, और समाधि के प्रकार। साधन पाद (55 सूत्र): क्रिया योग और अष्टांग योग का वर्णन। विभूति पाद (55 सूत्र): योग के दौरान प्राप्त होने वाली अलौकिक शक्तियों का वर्णन। कैवल्य पाद (34 सूत्र): आत्मा की स्वतंत्रता (कैवल्य) की स्थिति। योग दर्शन का परम लक्ष्य आत्मा को प्रकृति (मन, बुद्धि, अहंकार) से अलग पहचानकर शुद्ध चेतना या कैवल्य में स्थापित करना है, जिससे क्लेशों (दुखों) से मुक्ति मिल सके। यह आधुनिक समय में मानसिक स्थिरता और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
मीमांसा (पूर्व मीमांसा) – वेदों के कर्मकांडीय भाग की व्याख्या करता है। महर्षि जैमिनि द्वारा प्रवर्तित मीमांसा (पूर्व मीमांसा) भारतीय दर्शन के छह आस्तिक दर्शनों में से एक है, जिसका मुख्य उद्देश्य वेदों के कर्मकांडीय भाग (ब्राह्मणों) की व्याख्या और धर्म की वैज्ञानिक व्याख्या करना है। चौथी से दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास रचित ‘मीमांसा सूत्र’ (द्वादशलक्षण) में, जैमिनि ने वेदों को ‘अपौरुषेय’ और कर्म को धर्म मानते हुए, यज्ञ-अनुष्ठानों के माध्यम से जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने पर जोर दिया है।
मीमांसा के संस्थापक है महर्षि जैमिनि, जो ऋषि व्यास के शिष्य माने जाते हैं। मूल ग्रंथ है ‘मीमांसा सूत्र’ (जिसे ‘जैमिनी सूत्र’ या ‘द्वादशलक्षणी’ भी कहते हैं), जिसमें 12 अध्याय हैं। ‘अथातो धर्मजिज्ञासा’ (धर्म को जानने की इच्छा) के साथ धर्म के स्वरूप का अध्ययन। यह दर्शन मानता है कि वेदों द्वारा बताए गए कर्म या यज्ञ ही धर्म हैं, और इन अनुष्ठानों का सही ज्ञान और पालन अनिवार्य है। जैमिनि वेदों को अपौरुषेय (मनुष्य द्वारा नहीं रचित) और नित्य मानते हैं। मीमांसा में छ: प्रकार के प्रमाण माने गए हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति, अभाव और शब्द। यह ‘स्वत:प्रामाण्य’ को स्वीकार करता है। बादरायण (वेदांत) के साथ जैमिनि के मतों के विरोधाभास के बावजूद, इन दोनों के विचार भारतीय दर्शन की आधारशिला हैं। जैमिनि का दर्शन कर्मकांड, यज्ञों, शब्द-अर्थ के नित्य संबंध और धर्म की समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिस पर शबर, कुमारिल भट्ट और प्रभाकर जैसे विद्वानों ने भाष्य लिखे।
वेदांत (उत्तर मीमांसा) – उपनिषदों पर आधारित, जो ब्रह्म और आत्मा की एकता (अद्वैत) पर जोर देता है। वेदांत (उत्तर मीमांसा) भारतीय दर्शन के छह रूढ़िवादी स्कूलों में से एक है, जिसे महर्षि बादरायण द्वारा रचित ‘ब्रह्मसूत्र’ (उत्तर मीमांसा सूत्र) के आधार पर स्थापित किया गया है। यह वेदों के अंतिम भाग—उपनिषदों—के ज्ञान-काण्ड पर जोर देता है, जो मुख्य रूप से ब्रह्म (सर्वोच्च वास्तविकता), आत्मा (स्व), और मोक्ष के रहस्यों का अन्वेषण करता है। इसे ‘शारीरिक मीमांसा’ भी कहते हैं।इसके प्रवर्तक है महर्षि बादरायण (जिन्हें व्यास भी माना जाता है)।इस सिद्धांत का मूल ग्रंथ है ब्रह्मसूत्र (वेदांत सूत्र, शारीरिक सूत्र, या भिक्षु सूत्र के रूप में भी जाना जाता है)। यह पूर्व मीमांसा (कर्मकांड) के विपरीत, उपनिषदों की दार्शनिक और आध्यात्मिक शिक्षाओं को एकीकृत करता है। यह ब्रह्म को जगत का कारण और आत्मा (जीव) को ही ब्रह्मत्व के रूप में देखता है। इसमें ज्ञान और ध्यान/उपासना के माध्यम से ब्रह्म के साथ आत्मा के तादात्म्य का अनुभव करके मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त करने का मार्ग बताया गया है। बादरायण के सूत्रों पर आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य और वल्लभाचार्य जैसे विभिन्न आचार्यों ने भाष्य (टिप्पणियाँ) लिखे हैं, जिससे अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, और द्वैत जैसे मत विकसित हुए। इसे ‘उत्तर मीमांसा’ (बाद की जांच) या ‘वेदांत’ (वेद का अंतिम हिस्सा/निष्कर्ष) कहा जाता है। यह दर्शन, मुख्य रूप से, संसार के कारण, जीव की वास्तविक प्रकृति और ब्रह्म (परम वास्तविकता) के साथ इसके संबंध को समझने का एक दार्शनिक और तर्कसंगत प्रयास है।
आस्तिक दर्शन – जो वेदों की सत्ता में विश्वास करते हैं (षड्दर्शन)। नास्तिक दर्शन, जो वेदों को नहीं मानते (चार्वाक, जैन, और बौद्ध)। इसके अतिरिक्त, दर्शन के अंतर्गत अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, और द्वैत जैसे वेदांत के उप-संप्रदाय भी शामिल हैं जो भगवान और आत्मा के संबंध को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखते हैं।
हिन्दू दर्शन के प्रमुख गुण/विशेषताएं हैं – कर्म और पुनर्जन्म में विश्वास,यह दर्शन मानता है कि मनुष्य का भाग्य उसके अपने कार्यों (कर्मफल) द्वारा निर्धारित होता है और आत्मा अमर है, जो विभिन्न शरीरों में जन्म लेती है। त्रिविध गुण (सत्व, रजस, तमस) मानवीय अनुभव को तीन गुणों से प्रभावित माना जाता है सत्व (ज्ञान), रजस (सक्रियता/इच्छा), और तमस (अज्ञान)। मोक्ष का लक्ष्य,सांसारिक दुखों के चक्र से पूर्ण मुक्ति (मोक्ष) को जीवन का अंतिम उद्देश्य माना गया है। विविधता और स्वतंत्रता इसमें अद्वैत (निराकार ईश्वर) से लेकर द्वैत (सगुण ईश्वर) तक के अनेक दर्शन हैं, जो विचारों की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। चार पुरुषार्थ,जीवन को धर्म (नैतिकता), अर्थ (संसाधन), काम (इच्छाओं की पूर्ति), और मोक्ष (मुक्ति) के संतुलन पर आधारित किया गया है। योग और साधना, यह मन को वश में करने और मानसिक शुद्धि के लिए योग, भक्ति, ज्ञान और कर्म के विभिन्न मार्ग बताता है।नैतिकता (धर्म) सत्य, अहिंसा, करुणा, और कर्तव्य-पालन पर बहुत जोर दिया जाता है। यह दर्शन आध्यात्मिक विकास और व्यक्ति की आंतरिक पूर्णता पर केंद्रित है, न कि केवल बाहरी अनुष्ठानों पर।
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लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नोएडा महानगर मे केशव भाग के माननीय संघ चालक हैं।
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मेरी जन्म तिथि 4/4/1967
समय 11.30 प्रातः
अल्मोडा,
उत्राखंड