सावित्री बाई फुले 

सावित्री बाई फुले 

सतीश शर्मा

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था। इनके पिता का नाम खन्दोजी नैवेसे और माता का नाम लक्ष्मीबाई था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 1841 में महात्मा ज्योतिराव फुले से हुआ था। सावित्रीबाई फुले भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसिपल(महिला शिक्षिका)और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थीं। महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन के लिए उनका संघर्ष और समर्पण सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा। भारत की पहली महिला शिक्षिका, क्रांतिज्योती, नारी शिक्षा की जननी और सामाजिक न्याय की अटूट योद्धा थी। उनका जीवन एक जीता-जागता सबूत है कि शिक्षा ही सबसे बड़ा यज्ञ है। 19वीं सदी में जब लड़कियों को स्कूल जाना तो दूर, बाहर निकलना भी अपराध माना जाता था, तब सावित्रीबाई ने खुद किताबें सिर पर रखकर, पहला बालिका विद्यालय खोला। वे सिर्फ़ शिक्षिका नहीं थीं – विधवाओं के लिए आश्रय स्थापित किया,जाति-धर्म के भेदभाव के खिलाफ़ आवाज़ उठाई,प्लेग महामारी में मरीजों की सेवा करते-करते खुद संक्रमित होकर भी अंत तक सेवा में लगी रहीं, और 10 मार्च 1897 को हमें छोड़कर गईं।

उनके कुछ विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं: “विद्या हीन मनुष्य पशु के समान है।”  “जागो, शिक्षित हो, संगठित रहो और संघर्ष करो।” सावित्रीबाई का संदेश हमें याद दिलाता है कि बदलाव की शुरुआत एक कदम से होती है, एक स्कूल से होती है, एक किताब से होती है।

सावित्रीबाई फुले के मुख्य  कार्य निम्नलिखित है । 

1 जनवरी 1848 को पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खोला। 1850 तक उन्होंने लड़कियों और दलितों के लिए 18 से अधिक स्कूल स्थापित किए। उन्होंने प्रशिक्षित होकर पुणे और अहमदनगर में लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया, जिससे वह देश की पहली महिला शिक्षिका बनीं। 1863 में, विधवाओं की सुरक्षा और उनके बच्चों की देखभाल के लिए ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की। उन्होंने बाल विवाह, सती प्रथा, और छुआछूत जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ खुलकर संघर्ष किया। अपने पति के साथ मिलकर 1873 में ‘सत्यशोधक समाज’ के माध्यम से वंचितों, महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए कार्य किया। उन्होंने ‘काव्य फुले’ (1854) और ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ (1892) जैसी काव्य रचनाएं लिखीं, जो ज्ञान और शिक्षा के महत्व को दर्शाती हैं।  सावित्रीबाई फुले ने न केवल शिक्षा प्रदान की, बल्कि यह भी सिखाया कि शिक्षा ही सामाजिक असमानता को दूर करने का सबसे बड़ा हथियार है।

सतीश शर्मा जी द्वारा लेखन ,संकलन व सम्पादन 

“एक बच्चा, एक शिक्षक, एक किताब और एक पेन पूरी दुनिया बदल सकते हैं।”

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