हम एक साज़िश में फंस गए हैं मोदीजी
मनमीत सोनी 
कल कांग्रेस के नेता का प्रयागराज में भाषण सुना। पिछले कई दिनों से कितने ही लोगों से सुन चुका हूँ कि भारत का युवा जाग चुका है। दिल्ली में हम सबने देखा कि जब युवा जागता है तो वह क्या करता है और कैसे करता है और देसी – विदेशी टूलकिट में कितनी आसानी से फंसकर अपनी ही सरकार और अपने ही चुने हुए प्रधानमंत्री को माँ – बहन की गाली बकता है। और इसके बदले जब पिछवाड़े पर पुलिस के लट्ठ खाता है तो बिलकुल गली के कुकुर की तरह रोता है और भागता है और चीखता है और चिल्लाता है। पुलिस एफ आई आर की धमकी देती है तो वीडियो बनाता है कि : हमको माफ़ी दई दो माई बाप / हमरा कैरियर पुलिसिया चक्कर में लुल हुई जावेगा! यदि यही युवा का जागना है, तो ऐसे युवा का बीयर / शराब / गांजा पीकर नींद और बेखुदी में खोये रहना ही अच्छा है!
आप एक बार गौर से राहुल गाँधी को देखिये तो सही। यदि विपक्ष लोकतांत्रिक गरिमा को भूल कर देश के प्रमुख उद्योगपतियों पर, नेताओं पर और प्रधानमन्त्री पर अनर्गल आरोप लगाने लगे और इसे अपना अधिकार समझने लगे तो हमें सावधान हो जाना चाहिए। मुझे यह कहने में कोई संदेह नहीं कि भीतर ही भीतर वोट के माध्यम से नहीं, बल्कि हिंसा – धमकी – आरोप – और गिरी हुई राजनीति के जरिये भारत में तख्तापलट की कोशिश की जा रही है।
इतिहास गवाह है कि 1950 के बाद जिन भी देशों में तख्तापलट हुआ है, उन देशों ने अपनी दुर्गति करवाई है। वहाँ विकास के बजाय विनाश आया, वहाँ तंत्र के बजाय अराजकता आई, वहाँ अर्थव्यवस्था के बदले भुखमरी आई, वहाँ सरकार के बदले सेना आई, वहाँ स्थायित्व के बदले हमेशा बना रहने वाला डांवाडोल आया। मुझसे नहीं, अपने आप से पूछिए कि एक बेहद लोकतांत्रिक सरकार को और अपनी ही मौज में प्रगति कर रहे देश को केवल इसलिए अस्थिर करने का कु-चक्र रचना कितना खतरनाक है कि सरकार आपकी नहीं बल्कि दूसरी पार्टी की है। जबकि इसी देश में सम्पूर्ण क्रांति की ढुलमुल गाड़ी भी आई, राजनीतिक हत्याएँ भी हुईं, रामलीला मैदान में नौटंकियाँ भी हुई; लेकिन विरोधी से विरोधी ने भी यह कभी नहीं चाहा कि उसके पास सत्ता वाया “तख्तापलट” आए। यह तो खुले आम लोकतंत्र पर डकैती है। मेरा और करोड़ों भारतीयों का सरकार से यह सवाल है कि हज़ारों हरामज़ादे संसद से सौ मीटर की दूरी तक कैसे पहुँचे? यह कैसे सम्भव हुआ कि दिल्ली की छाती पर किसी जुनैद का बिरयानी – भन्डारा लगा? यह कैसे सम्भव हुआ कि अमेरिका से आयातित एक दो कौड़ी का अ-सभ्य गुंडा न केवल भीड़ इकट्ठा करने में सफल रहा बल्कि सरकार को घुटनों पर ले आया? कांग्रेस के नेता की यह कौनसी भाषा है कि फ़लां उद्योगपति की कितनी सम्पत्ति बढ़ी? आंकड़ा कहाँ से मिला? यह कौनसी भाषा है कि मोदी / तू / तेरा / तेरी? यह कौनसी भाषा है कि मोदी! मैं तुझसे नहीं डरता?
यह भारत का लोकतंत्र है! यहाँ लाख चाहने पर भी लालू प्रसाद यादव जैसे को लालू जी कहना पड़ता है। यहाँ हत्यारे तक को जब तक आरोप सिद्ध नहीं हो जाता, चुनाव लड़ने से नहीं रोका जाता। यहाँ न्याय का आदर्श वह अ-सहनीय सीमा छू जाता है कि अपनी ही गर्लफ्रेंड के पैंतीस टुकड़े करने वाला आफ़ताब भी सोशियोलोजी से एम.ए. कर सकता है! जब दलित नहीं भड़काए जा सके, जब भारत की भोली महिलाएँ नहीं बरगलाई जा सकी, जब कश्मीर का सपना टूट गया, जब वाया मणिपुर पूर्वोत्तर को जलाने की आशा भग्न हो गई तो वे अंततः हार कर हमारे भविष्य हमारे “विद्यार्थी – वर्ग” पर आ गए हैं।
छात्र-संघ चुनावों के नाम पर लाखों विद्यार्थी अपना जीवन इस देश में तबाह कर चुके हैं। छात्र-राजनीति ने इस देश को नेता कम और बाहुबली गुंडे अधिक दिए हैं। माफिया और बलात्कारी दिए हैं। मैं फिर कहता हूँ कि राजनीति में छात्रों को घसीटकर विपक्ष जो राजनीति करना चाह रहा है, यदि वह सफल हो गई तो यह देश कई टुकड़ों में टूट जाएगा। एक बाईस बरस की लड़की, जिसे बात करने तक की तमीज़ नहीं और जिसके समर्थक उमर खालिद और शर्जील इमाम के चमचे हों, उस पर किसी ग़ुस्साए लड़के ने स्याही क्या फेंक दी, साला लोकतंत्र खतरे में आ गया! जबकि दिल्ली का दिमाग़ कहे जाने वाले जे एन यू में ढफली बजा – बजा कर कुछ बौद्धिक हिंजड़ों ने भारत के खिलाफ़ नारे लगाए तो वह क्रांति का उद्घोष था? एक टेढ़े-मेढ़े दाँत वाली छोकरी खुलकर कह रही है कि वह गर्व से कहती है कि वह उमर खालिद को सपोर्ट करती है! डूब मरो,,,,,,,,,,!
फिर कहता हूँ। छात्र वह जो पढ़े। छात्र वह जो गुरु का सम्मान करे। छात्र वह जो व्यवस्था के भीतर रह कर व्यवस्था को बदले। छात्र वह जिसे अपनी सीमाओं और गरिमाओं का ध्यान हो। छात्र वह नहीं जो गुंडई करे। छात्र वह नहीं जो प्रधानमंत्री की माँ बहन करे। यदि छात्र प्रधानमंत्री की माँ बहन करे और संसद से सौ मीटर दूर खड़ा होकर संसद को फूंक डालने का स्वप्न देखे तो इसकी सज़ा बिना ‘इफ एन्ड बट’ के सश्रम कारावास है। पिछले बारह बरस से उनके मन में जो शूल है, वह कैक्टस बन चुका है। यह नेता इससे ज़्यादा बूढा होना “अफोर्ड” नहीं कर सकता। उसकी की मंत्री परिषद उसे नियंत्रित करने के बजाय उसके हृदय की आग में सूखे नारियल और खील-बताशे फेंक रही है। यह हमारे जागने का समय है। यह आम भारतीयों के उठ खड़े होने का समय है। यह समय है कि लोकतंत्र के समर्थक कड़वी और सीधी भाषा बोलें। वे विपक्ष की अ-लोकतांत्रिक राजनीति के बहकावे में न आवें। वे साफ़-साफ़ कहें : इस देश में वोट की राजनीति होगी, धमकी – दबंगई – प्रेशर ग्रुप की राजनीति नहीं होगी।
और सरकार तुम, तुम.होश में आओ! तुम्हारी कथित नैतिकता की वजह से ही इन टुटपूंजियों का इतना साहस हुआ है। जिन्हें जेल के पीछे होना चाहिए, वे छात्रों को खुले आम सम्बोधित कर रहे हैं। पिछवाड़े पर लट्ठ मारो या मिर्ची भरो, लेकिन यह राष्ट्रव्यापी नौटंकी बंद होनी चाहिए। लोकतंत्र का मतलब खुली अराजकता नहीं होता। आप साफ़ देख पा रहे हैं कि इस देश की एकता अखंडता को खतरा है। मज़बूत से मज़बूत बिल लाओ। पुराने क़ानूनों को अपडेट करो। सोशल मीडिया पर सर्विलियेंस करो। हर झूठी रील / वीडियो का सबूत मांगो। यदि इतने वोटों से जीतने के बावजूद आप में यह हिम्मत नहीं है तो फिर यह हिम्मत कब होगी? यह इंस्टाग्राम पर वीडियो बनाने का नहीं, इंस्टाग्राम के गटर को हार्पिक से साफ़ करने का समय है। यह देश किसी भी हाल में तुर्की, क्यूबा, ईरान, पोलैंड, कोरिया, थाईलैंड और बोलिविया नहीं बनना चाहिए। यह भारत राजेंद्र प्रसाद का ज़मीर है। पटेल की ज़िद है। अटल की लोच है तो मोदीजी आपकी कठोरता भी है। मैं हाथ जोड़ता हूँ सरकार! कृपया उन लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर मत कीजिये कि जिनका विश्वास है कि राजनीति सड़कों से नहीं, पोलिंग बूथ से संचालित होगी! हमें विश्व के उदारतम लोकतंत्र की नही, बल्कि आपसे पहली और अपनी तरह की अकेली उदार तानाशाही चाहिए महाराज!







