अखंड भारत: एक भौगोलिक सत्य या सांस्कृतिक विचार
सतीश शर्मा 
अखंड भारत दिवस या अखंड भारत संकल्प दिवस हर साल 14 अगस्त को मनाया जाता है। यह दिन वर्ष 1947 में हुए भारत के भौगोलिक विभाजन के दर्द को याद करने और भारत की प्राचीन सांस्कृतिक व आध्यात्मिक एकता को पुन: स्थापित करने के संकल्प को दोहराने के लिए समर्पित है।अखंड अखंड भारत’ से तात्पर्य उस अविभाजित भारतवर्ष से है जिसकी सीमाएं प्राचीन काल में अत्यंत विस्तृत थीं। इसमें वर्तमान भारत के साथ-साथ पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, म्यांमार (बर्मा), श्रीलंका, नेपाल, भूटान और तिब्बत क्षेत्र शामिल थे । प्राचीन ग्रंथों और इतिहास के अनुसार, चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक और बाद में पेशवा बाजीराव जैसे शासकों के काल में इस वृहद् भू-भाग की सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना एक थी।
मुगल ओर ब्रिटिश शासकों के कारण भारत का विभाजन विभिन कारणों से हुआ। 14 अगस्त 1947 की रात को ब्रिटिश हुकूमत की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के कारण भारत का विभाजन हुआ। पंजाब, बंगाल और सिंध जैसे क्षेत्रों में भीषण सांप्रदायिक हिंसा हुई। ननकाना साहिब, कटासराज और सिंधु नदी जैसे भारत की सभ्यता के प्रतीक माने जाने वाले प्रमुख ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल देश की भौगोलिक सीमाओं से बाहर हो गए। यह दिवस किसी राजनीतिक विस्तारवाद के लिए नहीं, बल्कि एक वैचारिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देश की युवा पीढ़ी को विभाजन के इतिहास से अवगत कराने के लिए संगोष्ठियां और बौद्धिक सत्र आयोजित किए जाते हैं। जातिवाद और क्षेत्रवाद से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता और समरसता को मजबूत करने का संकल्प लिया जाता है। अखंड भारत दिवस केवल अतीत के विभाजन के शोक का दिन नहीं है, बल्कि यह भविष्य के लिए एक सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह याद दिलाता है कि भले ही राजनीतिक रूप से सीमाएं बदल गई हों, लेकिन इस उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक, भाषाई और आध्यात्मिक आत्मा आज भी एक है।
अखंड भारत की सांस्कृतिक एकता और गौरवशाली इतिहास – भारत की पारम्परिक सीमा “त्रिविष्टप” (तिब्बत) भारत के उत्तर में रही है। कैलाश मानसरोवर, गान्धार, कश्यप-सागर (कैस्पियन सागर), बर्मा (ब्रह्मदेश), श्रीलंका, ईरान (आर्यान), अफगानिस्तान (उप गणस्थान) आदि भारत के अंग रहे हैं।
वृहत्तर भारत की सीमाएं- दक्षिण में हिन्दु महासागर और पूर्व में ब्रह्मदेश, श्याम, काम्बोज, द्वारावती (सुमात्रा), स्वर्ण दीप (बोर्नियो), सिंह द्वीप आदि । हिन्दु एशिया (इण्डोनेशिया) पश्चिम में यूनान तक महाभारत का विस्तार । समस्त पृथ्वी पर चक्रवर्तियों का शासन (धर्मानुशासन)। महाभारत के युद्ध (जनमेजय) के बाद चक्रवर्ती प्रथा समाप्त। भारत की सीमायें क्रमश: संकुचित । बुद्ध के पश्चात् सैनिक तैयारियाँ और जागरुकता भी बन्द । चन्द्रगुप्त मौर्य को फिर से दहेज में गान्धार मिला परन्तु अरब आक्रमण के बाद गान्धार अफगानिस्तान बना। अँग्रेजों के ‘भारत-साम्राज्य’ में बलोचिस्तान, पाकिस्तान, श्रीलंका, बर्मा (ब्रह्मदेश) और मलाया का एक भाग भारत का ही अंग माना जाता था।
भारत को पहले अखण्ड भारत कहते थे | क्यूंकि भारत पुरे विश्व में बहुत बड़ा था | समय के साथ यहाँ के बटवारे होते गए | आपको यह जानकर हैरानी होगी | भारत से ही 15 देशों का जन्म हुआ |
यह कैसे हुआ | यह 15 देश कौन से है | यह जानिए —
ईरान – जब भारत से आर्यन ईरान में बलुचिस्थान में पहुंचे | तब वहाँ बस गए | उसी से इसका नाम इरयाना पड़ा |उसके बाद अरबो ने यहाँ आक्रमण किया | साथ ही यह बस गए | तब इसका नाम ईरान पड़ा। कम्बोडिया – प्रथम शताब्दी में कम्बोडि नामक भरतीय ब्राह्मण ने इस देश में हिन्दू राज की स्थापना की | इसी से इसका नाम कम्बोडिया पड़ा । वियतनाम – इस देश का नाम पहले चम्पा था यह भारत का एक अंग था 1825 में चम्पा में हिन्दुराज समाप्त हुआ यह एक अलग देश बना। मलेशिया – यहाँ बोध धर्म भारतीयों ने स्थापित किया | यह देश भारतीय संस्कृति के लिए मशहूर था | 1948 में अंग्रेजों से आजाद होकर यह अलग देश बना। इंडोनेशिया – यह भारत का संपन्न देश था | यहाँ हिन्दू कम रह गए | फिर यह एक अलग मुस्लिम देश बना | परन्तु यहाँ आज भी राम मंदिर है | जहाँ मुस्लिम पूजा करते है। फिलिपींस – मुसलमानो ने आक्रमण कर यहाँ अपना राज जमा लिया । फिर यह अलग देश बना ,परन्तु आज भी यहाँ हिन्दू रीती रिवाज अपनाये जाते है। अफगानिस्तान – यह भारत का एक अंग था । यहाँ हिंदू राजा अम्बी का राज था | जिसने सिकंदर से संधि कर उसे यह राज्य दिया था | महाभारत के शकुनि और गंधारी यहाँ कन्दरि के थे | इस्लाम के बाद यह भारत से सांस्कृतिक रूप से भी अलग देश बन गया ।1876,नेपाल – यह भारत का एक अंग था | इसका एकीकरण एक गोरखे ने किया | महात्मा बुद्ध यही राजवंश के थे,1904,भूटान – यह पहले भारत के भद्रदेश से जाना जाता था | हमारे ग्रंथो में इस देश का उल्लेख है | 1906 में इसे एक संपन्न राज्य घोषित कर दिया। तिब्बत – हमारे ग्रंथो में त्रिविशिस्ट के नाम से इसका नाम है | भारतीय शासको को हराकर चीन ने इसे अपने में मिला लिया।1914,श्रीलंका – इसका नाम ताम्रपानी था | पहले पुर्तगाली , फिर अंग्रेजो ने यहाँ अधिकार किया | 1937 में अंग्रेजो ने इसे भारत से अलग कर दिया। म्यांमार – इसका पहले नाम बर्मा था | यहाँ का प्रथम राजा वाराणसी का राजकुमार था | 1852 में अंग्रेजो ने यह अधिकार किया | 1937 में इसे भारत से अलग कर दिया। पाकिस्तान – यहाँ आज़ादी के बाद बहुत से हिन्दू मंदिर तोड़ दिए गए थे | सभी जानते है | यह भारत से अलग हुआ देश है।1947,बांग्लादेश – यह देश भी 15 अगस्त से पहले भारत का अंग था | फिर यह पूर्वी पाकिस्तान का अंग बना 1971 में भारतीय फ़ौज ने इसे पाकिस्तान से अलग कराया |
थाईलैंड – इसका प्राचीन भारतीय नाम श्यामदेश था | पहले यहाँ हिन्दू राजस्व था | बाद में यहाँ बोध प्रचार हुआ।
भारत को जाने – मुख्य शहर – काशी ,कांची ,आव्न्तिका ,वैशाली ,गया ,जगन्नाथ पुरी ,विजय नगर ,पाटलिपुत्र ,प्रयागराज ,अम्रतसर ,सोमनाथ ,तक्षशिला, ,द्वरिका ,इन्द्रप्रस्थ,हरिद्वार, अयोध्या मथुरा-वृंदावन ,नासिक, चित्रकूट,रामेश्वरम
अयोध्या – मान्यता है कि इस नगर को मनु ने बसाया था और इसे ‘अयोध्या’ का नाम दिया जिसका अर्थ होता है अयोध्या अर्थात् ‘जिसे युद्ध के द्वारा प्राप्त न किया जा सके। – द्वारका – भारत के गुजरात राज्य के देवभूमि द्वारका ज़िले में स्थित एक प्राचीन नगर और नगरपालिका है। द्वारका गोमती नदी और अरब सागर के किनारे ओखामंडल प्रायद्वीप के पश्चिमी तट पर बसा हुआ है। यह हिन्दुओं के चारधाम में से एक है और सप्तपुरी में से भी एक है। यह श्रीकृष्ण के प्राचीन राज्य द्वारका का स्थल है और गुजरात की सर्वप्रथम राजधानी माना जाता है।
काशी – विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है – ‘काशिरित्ते.. आप इवकाशिनासंगृभीता:’। पुराणों के अनुसार यह आद्य वैष्णव स्थान है। पहले यह भगवान विष्णु (माधव) की पुरी थी। उज्जैन– स्कन्द पुराण के 28वें अध्याय में उल्लेख है कि इस नगर के अधिष्ठाता देव महादेव ने त्रिपुरी के शक्तिशाली राक्षस अंधकासुर को पराजित कर विजय प्राप्त की। अतः स्मृति स्वरूप उज्जयिनी नाम रखा गया। उज्जयिनी अवन्ति जनपद की महत्वपूर्ण नगरी थी; जो कालान्तर में राजधानी बन गई। इसी कारण अवन्तिका अवन्तिपुरी के नाम से विख्यात हो गई। हरिद्वार – हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों में से एक है। 3139 मीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने स्रोत गोमुख (गंगोत्री हिमनद) से 253 किमी की यात्रा करके गंगा नदी हरिद्वार में मैदानी क्षेत्र में प्रथम प्रवेश करती है, इसलिए हरिद्वार को ‘गंगाद्वार’ के नाम से भी जाना जाता है; जिसका अर्थ है वह स्थान जहाँ पर गंगाजी मैदानों में प्रवेश करती हैं। हरिद्वार का अर्थ “हरि (ईश्वर) का द्वार” होता है।
मथुरा – मथुरा ऐतिहासिक रूप से कुषाण राजवंश द्वारा राजधानी के रूप में विकसित नगर है। उससे पूर्व भगवान कृष्ण के समय काल से भी पूर्व अर्थात लगभग 7500 वर्ष से यह नगर अस्तित्व में है.यह धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। रामेश्वरम – जिसे तमिल लहजे में “इरोमेस्वरम” भी कहा जाता है, भारत के तमिल नाडु राज्य के रामनाथपुरम ज़िले में एक तीर्थ नगर है, जो हिन्दू धर्म के पवित्रतम चार धाम तीर्थस्थलों में से एक है।
नासिक – भारत के महाराष्ट्र राज्य के नाशिक ज़िले में स्थित एक नगर है।नाशिक गोदावरी नदी के किनारे बसा हुआ है । यह शहर प्रमुख रूप से हिन्दू तीर्थयात्रियों का प्रमुख केन्द्र है। इस शहर का सबसे प्रमुख भाग पंचवटी है। जगन्नाथ पुरी – भारत के ओड़िशा राज्य के पुरी ज़िले में बंगाल की खाड़ी से तटस्थ एक नगर है। यह ज़िले का मुख्यालय भी है। पुरी भारत के चार धाम में से एक है और यहाँ 12वीं शताब्दी के जगन्नाथ मन्दिर स्थित होने के कारण इसे श्री जगन्नाथ धाम भी कहा जाता है।
प्रयागराज – जिसका भूतपूर्व नाम इलाहाबाद था, भारत के उत्तर प्रदेश राज्य का एक प्रमुख नगर है। यह प्रयागराज ज़िले का मुख्यालय है और हिन्दूओं का एक मुख्य तीर्थस्थल है। इसका प्राचीन नाम प्रयाग था। हिन्दू धर्मग्रन्थों में वर्णित प्रयाग स्थल पवित्रतम नदी गंगा और यमुना के संगम पर स्थित है।
पाटलिपुत्र – बिहार की राजधानी पटना का पुराना नाम पाटलिपुत्र,कुसुमपुर,पुष्पपुरी और अजिमावाद था। पवित्र गंगा नदी के दक्षिणी तट पर बसे इस शहर को लगभग 2000 वर्ष पूर्व पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था। अमृतसर – जिसका ऐतिहासिक नाम रामदासपुर और जिसे आम बोलचाल में अम्बरसर कहा जाता है, यह सिख धर्म का सबसे पवित्र नगर है और यहाँ सबसे बड़ा गुरद्वारा, स्वर्ण मंदिर, स्थित है। स्वर्ण मंदिर अमृतसर का हृदय माना जाता है। यह गुरू रामदास का डेरा हुआ करता था। कांची – कांचीपुरम उत्तरी तमिलनाडु के प्राचीन व मशहूर शहरों में से एक है। कांचीपुरम को दक्षिण की काशी भी कहा जाता है। यह मद्रास से 45 मील की दूरी पर दक्षिण–पश्चिम में स्थित है। कांचीपुरम को पूर्व में कांची कहा जाता था और अब यह कांचीवरम के नाम से भी प्रसिद्ध है। तक्षशिला – वर्तमान समय में तक्षशिला, पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के रावलपिण्डी जिले की एक तहसील तथा महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है जो इस्लामाबाद और रावलपिण्डी से लगभग 32 किमी उत्तर-पूर्व में स्थित है। इंद्रप्रस्थ – इसे कुरु साम्राज्य की राजधानी के रूप में वर्णित किया गया है, जो यमुना नदी पर स्थित है। बौद्ध साहित्य में हथिनीपुरा (हस्तिनापुर) और कुरु साम्राज्य के कई छोटे शहरों और गांवों का भी उल्लेख है। नई दिल्ली के रायसीना क्षेत्र में खोजे गए 1327 सीई के एक संस्कृत शिलालेख में इंद्रप्रस्थ को दिल्ली क्षेत्र के एक प्रतिगण (जिला) के रूप में भी नामित किया गया है। सोमनाथ – गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बन्दरगाह में स्थित इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में स्पष्ट है। यह मन्दिर हिन्दू धर्म के उत्थान-पतन के इतिहास का प्रतीक रहा है। चित्रकूट धाम – भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के चित्रकूट जिले में स्थित एक शहर है। यह उस जिले का मुख्यालय भी है। यह बुन्देलखण्ड क्षेत्र मे स्थित है और बहुत सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक महत्व रखता है। चित्रकूट भगवान राम की कर्म भूमि है। भगवान राम ने वनवास के 11 वर्ष चित्रकूट मे बिताये थे। गया – भारत के बिहार राज्य के गया ज़िले में स्थित एक नगर है। यह ज़िले का मुख्यालय और बिहार राज्य का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। इस क्षेत्र के लोग मगही भाषा बोलते हैं और गया भारत के अतंरराष्ट्रीय पर्यटक स्थलों मे से एक हैं यहाँ पर विदेशी पर्यटकों लाखों की संख्या मे आते हैंइस नगर का हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्मों में गहरा ऐतिहासिक महत्व है। शहर का उल्लेख रामायण और महाभारत में मिलता है। गया तीन ओर से छोटी व पत्थरीली पहाड़ियों से घिरा है, जिनके नाम मंगला-गौरी, श्रृंग स्थान, रामशिला और ब्रह्मयोनि हैं। नगर के पूर्व में फल्गू नदी बहती है वैशाली – दुनिया में पहली गणराज्य होने का विश्वास, वैशाली ने महाभारत काल के राजा विशाल से अपना नाम लिया है। कहा जाता है कि वह यहां एक महान किला का निर्माण कर रहा है, जो अब खंडहर में है। वैशाली एक महान बौद्ध तीर्थ है और भगवान महावीर के जन्मस्थान भी है। ऐसा कहा जाता है कि बुद्ध ने तीन बार इस जगह का दौरा किया और यहां काफी समय बिताया। बुद्ध ने वैशाली में अपना आखिरी प्रवचन भी दिया और यहां अपने निर्वाण की घोषणा की। उनकी मृत्यु के बाद, वैशाली ने दूसरी बौद्ध परिषद भी आयोजित की।
मुख्य नदी – गंगा ,गंगा भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी है। यह भारत और बांग्लादेश में कुल मिलाकर 2525 किलोमीटर की दूरी तय करती हुई उत्तराखंड में हिमालय के गंगोत्री हिमनद के गोमुख स्थान से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुन्दरवन तक भारत की मुख्य नदी के रूप में विशाल भू-भाग को सींचती है। यमुना – यमुना भारत की एक नदी है। यह गंगा नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है जो यमुनोत्री नामक जगह से निकलती है और प्रयाग में गंगा से मिल जाती है। इसकी प्रमुख सहायक नदियों में चम्बल, सेंगर, छोटी सिन्धु, बेतवा और केन उल्लेखनीय हैं। यमुना के तटवर्ती नगरों में दिल्ली और आगरा के अतिरिक्त इटावा, कालपी, हमीरपुर और प्रयाग मुख्य है। सरस्वती – यह सिंधु घाटी सभ्यता से पहले की संस्कृति है और सिंधु घाटी सभ्यता में भी जारी रही. ऐसा अनुमान है कि 900 BC में सरस्वती सूखने लगी. यह नदी आदिबद्री (देहरादून के नजदीक) और राजस्थान, गुजरात से बहते हुए अरब सागर में जाकर गिरती थीइसे प्लाक्ष्वती, वेद्समृति, वेदवती भी कहते है! ऋग्वेदमें सरस्वती का अन्नवती तथा उदकवती के रूप में वर्णन आया है। यह नदी सर्वदा जल से भरी रहती थी और इसके किनारे अन्न की प्रचुर उत्पत्ति होती थी। सिधु – सिन्धु नदी एशिया की सबसे लम्बी नदियों में से एक है। यह पाकिस्तान, भारत और चीन के माध्यम से बहती है। सिन्धु नदी का उद्गम स्थल, तिब्बत के मानसरोवर के निकट सिन-का-बाब नामक जलधारा माना जाता है। इस नदी की लम्बाई प्रायः 3610 किलोमीटर है। यहाँ से यह नदी तिब्बत और कश्मीर के बीच बहती है,ब्रहमपुत्र – ब्रह्मपुत्र भारत की प्रमुख नदियों में से एक है। यह तिब्बत, भारत तथा बांग्लादेश से होकर बहती है। ब्रह्मपुत्र का उद्गम हिमालय के उत्तर में तिब्बत के पुरंग जिले में स्थित मानसरोवर झील के निकट होता है, जहाँ इसे यरलुङ त्सङ्पो कहा जाता है। तिब्बत में बहते हुए यह नदी भारत के अरुणांचल प्रदेश राज्य में प्रवेश करती है।2,900 km,गण्डकी – गण्डकी नदी, नेपाल और बिहार में बहने वाली एक नदी है जिसे बड़ी गंडक या केवल गंडक भी कहा जाता है। इस नदी को नेपाल में सालिग्रामि या सालग्रामी और मैदानों मे नारायणी और सप्तगण्डकी कहते हैं। यूनानी के भूगोलवेत्ताओं की कोंडोचेट्स तथा महाकाव्यों में उल्लिखित सदानीरा भी यही है।८१४,कावेरी – कावेरी कर्नाटक तथा उत्तरी तमिलनाडु में बहनेवाली एक सदानीरा नदी है। यह पश्चिमी घाट के पर्वत ब्रह्मगिरीसे निकली है। इसकी लम्बाई प्रायः 760 किलोमीटर है। दक्षिण पूर्व में प्रवाहित होकर कावेरी नदी बंगाल की खाड़ी में मिली है। सिमसा, हेमावती, भवानी इसकी उपनदियाँ है। महानदी – छत्तीसगढ़ तथा ओड़िशा अंचल की सबसे बड़ी नदी है। प्राचीनकाल में महानदी का नाम चित्रोत्पला था। महानन्दा एवं नीलोत्पला भी महानदी के ही नाम हैं। महानदी का उद्गम रायपुर के समीप धमतरी जिले में स्थित सिहावा नामक पर्वत श्रेणी से हुआ है। महानदी का प्रवाह दक्षिण से उत्तर की तरफ है। रेवा-नर्मदा नदी – जिसे स्थानीय रूप से कही-कही रेवा नदी भी कहा जाता है, भारत के 5वीं सबसे लम्बी नदी और पश्चिम-दिशा में बहने वाली सबसे लम्बी नदी है। यह मध्य प्रदेश राज्य की भी सबसे बड़ी नदी है। नर्मदा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में बहती है।१३१२,गोदा,गोदावरी नदी – भारत के प्रायद्वीपीय भाग की एक प्रमुख नदी है। यह नदी दूसरी प्रायद्वीपीय नदियों में से सबसे बड़ी नदी है। इसे दक्षिण गंगा भी कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति पश्चिमी घाट में त्रयंबक पहाड़ी से हुई है। यह महाराष्ट्र में नाशिक ज़िले से निकलती है। इसकी लम्बाई प्रायः 1465 किलोमीटर है। इस नदी का पाट बहुत बड़ा है।
मुख्य पर्वत – हिमालय,महेंद्र पर्वत उड़ीसा, मलयगिरि पर्वत मैसूर, सह्याद्रि पर्वत पश्चिमी घाट, रैवतक सौराष्ट्र मे गिरनार, विंध्यांचल तथा अरावली राजस्थान , मुख्य सरोवर पञ्च सरोवर – १. पम्पा सरोवर (कर्नाटक), २. मानसरोवर (तिब्बत). ३. पुष्कर सरोवर (राजस्थान), ४. बिन्दु सरोवर (गुजरात), ५. नारायण सरोवर (गुजरात)। चार मठ – हिंदू धर्म का संत समाज शंकराचार्य द्वारा नियुक्त चार मठों के अधीन है। हिंदू धर्म की एकजुटता और व्यवस्था के लिए चार मठों की परंपरा को जानना आवश्यक है।
चार मठों से ही गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वाह होता है। चार मठों के संतों को छोड़कर अन्य किसी को गुरु बनाना हिंदू संत धारा के अंतर्गत नहीं आता। आदिशंकराचार्यजी ने जो चारपीठ स्थापित किये,उनके काल निर्धारण में उत्थापित की गई भ्रांतियाँ –1. उत्तर दिशा में बदरिकाश्रम में ज्योतिर्पीठ स्थापना-युधिष्ठिर संवत् (Y.S.) 2641-2645,2. पश्चिम में द्वारिकाशारदा पीठ- यु.सं.(Y.S.) 2648,3.दक्षिण शृंगेरीपीठ- 2648 Y.S.,4. पूर्व दिशा जगन्नाथपुरीगोवर्द्धन पीठ 2655 Y.S.शंकराचार्य जी ने इन मठों की स्थापना के साथ-साथ उनके मठाधीशों की भी नियुक्ति की, जो बाद में स्वयं शंकराचार्य कहे जाते हैं। जो व्यक्ति किसी भी मठ के अंतर्गत संन्यास लेता हैं वह दसनामी संप्रदाय में से किसी एक सम्प्रदाय पद्धति की साधना करता है। ये चार मठ निम्न हैं:- श्रृंगेरी मठ – श्रृंगेरी मठ भारत के दक्षिण में चिकमंगलुुुर में स्थित है।श्रृंगेरी मठ के अन्तर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले संन्यासियों के नाम के बाद सरस्वती, भारती तथा पुरी सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य ‘अहं ब्रह्मास्मि’ है तथा मठ के अन्तर्गत ‘यजुर्वेद’ को रखा गया है। इस मठ के प्रथम मठाधीश आचार्य सुरेश्वरजी थे, जिनका पूर्व में नाम मण्डन मिश्र था।वर्तमान में स्वामी भारती कृष्णतीर्थ इसके 36वें मठाधीश हैं। गोवर्धन मठ – गोवर्धन मठ भारत के पूर्वी भाग में ओडिशा राज्य के जगन्नाथ पुरी में स्थित है। गोवर्धन मठ के अंतर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले सन्यासियों के नाम के बाद ‘वन’ व ‘आरण्य’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य है ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ तथा इस मठ के अंतर्गत ‘ऋग्वेद’ को रखा गया है। इस मठ के प्रथम मठाधीश आदि शंकराचार्य के प्रथम शिष्य पद्मपाद चार्य हुए। वर्तमान में निश्चलानन्द सरस्वती इस मठ के 145 वें मठाधीश हैं। शारदा मठ – शारदा (कालिका) मठ गुजरात में द्वारकाधाम में स्थित है। शारदा मठ के अंतर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले सन्यासियों के नाम के बाद ‘तीर्थ’ और ‘आश्रम’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य है ‘तत्त्वमसि’ तथा इसके अंतर्गत ‘सामवेद’ को रखा गया है। शारदा मठ के प्रथम मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे। हस्तामलक शंकराचार्य जी के प्रमुख चार शिष्यों में से एक थे।हस्तामलक आदि शंकराचार्य के प्रमुख चार शिष्यों में से एक थे। वर्तमान में पश्चिमाम्नाय द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानन्द सरस्वती जी इसके 80 वें मठाधीश हैं । ज्योतिर्मठ – उत्तरांचल के बद्रीनाथ में स्थित है ज्योतिर्मठ। ज्योतिर्मठ के अंतर्गत दीक्षा प्राप्त करने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘गिरि’, ‘पर्वत’ एवं ‘सागर’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उक्त संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य ‘अयमात्मा ब्रह्म’ है। इस मठ के अंतर्गत अथर्ववेद को रखा गया है। ज्योतिर्मठ के प्रथम मठाधीश त्रोटकाचार्य बनाए गए थे। वर्तमान में “परमाराध्य” परमधर्माधीश अनन्तश्रीविभूषित जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती महाराज ‘1008’ जी इसके 53 वें मठाधीश हैं। उक्त मठों तथा इनके अधीन उपमठों के अंतर्गत संन्यस्त संतों को गुरु बनाना या उनसे दीक्षा लेना ही हिंदू धर्म के अंतर्गत माना जाता है। यही हिंदुओं की संत धारा मानी गई है। द्वादश ज्योतिर्लिंग – सोमनाथ (गुजरात), नागेश्वर अथवा नागनाथ (गुजरात), भीमशंकर (महाराष्ट्र), त्र्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र), घुश्मेश्वर “घृष्णेश्वर” (महाराष्ट्र), महाकालेश्वर (मध्य प्रदेश), ओंकारेश्वर अथवा अमलेश्वर (मध्य प्रदेश), वैद्यनाथ (झारखण्ड), केदारनाथ (उत्तराखण्ड), विश्वनाथ (उत्तर प्रदेश), रामेश्वरम् (तमिलनाडु), मल्लिकार्जुन (आन्ध्र प्रदेश)।
देवी मां के 52 शक्तिपीठ – धर्मग्रंथों के अनुसार, माता सती के अंग जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ 52 प्रमुख शक्तिपीठ बने। ये पवित्र स्थल भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका और तिब्बत में फैले हुए हैं।
1. हिंगलाज- हिंगुला या हिंगलाज शक्तिपीठ जो कराची से 125 किमी उत्तर पूर्व में स्थित है, जहाँ माता का ब्रह्मरंध (सिर) गिरा था। इसकी शक्ति- कोटरी (भैरवी-कोट्टवीशा) है और भैरव को भीमलोचन कहते हैं। 2. शर्कररे (करवीर)- पाकिस्तान में कराची के सुक्कर स्टेशन के निकट स्थित है शर्कररे शक्तिपीठ, जहां माता की आँख गिरी थी। इसकी शक्ति- महिषासुरमर्दिनी और भैरव को क्रोधिश कहते हैं। 3. सुगंधा- सुनंदा- बांग्लादेश के शिकारपुर में बरिसल से 20 किमी दूर सोंध नदी के किनारे स्थित है माँ सुगंध, जहाँ माता की नासिका गिरी थी। इसकी शक्ति है सुनंदा और भैरव को त्र्यंबक कहते हैं। 4. कश्मीर- महामाया- भारत के कश्मीर में पहलगाँव के निकट माता का कंठ गिरा था। इसकी शक्ति है महामाया और भैरव को त्रिसंध्येश्वर कहते हैं। 5. ज्वालामुखी- सिद्धिदा (अंबिका)- भारत के हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में माता की जीभ गिरी थी, उसे ज्वालाजी स्थान कहते हैं। इसकी शक्ति है सिद्धिदा (अंबिका) और भैरव को उन्मत्त कहते हैं। 6. जालंधर- त्रिपुरमालिनी- पंजाब के जालंधर में छावनी स्टेशन के निकट देवी तलाब जहाँ माता का बायाँ वक्ष (स्तन) गिरा था। इसकी शक्ति है त्रिपुरमालिनी और भैरव को भीषण कहते हैं। 7. वैद्यनाथ- जयदुर्गा- झारखंड के देवघर में स्थित वैद्यनाथधाम जहाँ माता का हृदय गिरा था। इसकी शक्ति है जय दुर्गा और भैरव को वैद्यनाथ कहते हैं। 8. नेपाल- महामाया- नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर के निकट स्थित है गुजरेश्वरी मंदिर जहाँ माता के दोनों घुटने (जानु) गिरे थे। इसकी शक्ति है महशिरा (महामाया) और भैरव को कपाली कहते हैं। 9. मानस- दाक्षायणी- तिब्बत स्थित कैलाश मानसरोवर के मानसा के निकट एक पाषाण शिला पर माता का दायाँ हाथ गिरा था। इसकी शक्ति है दाक्षायनी और भैरव अमर हैं। 10. विरजा- विरजाक्षेत्र- भारतीय प्रदेश उड़ीसा के विराज में उत्कल स्थित जगह पर माता की नाभि गिरी थी। इसकी शक्ति है विमला और भैरव को जगन्नाथ कहते हैं। 11. गंडक- गंडकी- नेपाल में गंडकी नदी के तट पर पोखरा नामक स्थान पर स्थित मुक्तिनाथ मंदिर, जहाँ माता का मस्तक या गंडस्थल अर्थात कनपटी गिरी थी। इसकी शक्ति है गण्डकी चण्डी और भैरव चक्रपाणि हैं। 12. बहुला- बहुला (चंडिका)- भारतीय प्रदेश पश्चिम बंगाल से वर्धमान जिला से 8 किमी दूर कटुआ केतुग्राम के निकट अजेय नदी तट पर स्थित बाहुल स्थान पर माता का बायाँ हाथ गिरा था। इसकी शक्ति है देवी बाहुला और भैरव को भीरुक कहते हैं। 13. उज्जयिनी- मांगल्य चंडिका- भारतीय प्रदेश पश्चिम बंगाल में वर्धमान जिले से 16 किमी गुस्कुर स्टेशन से उज्जयिनी नामक स्थान पर माता की दायीं कलाई गिरी थी। इसकी शक्ति है मंगल चंद्रिका और भैरव को कपिलांबर कहते हैं। 14. त्रिपुरा- त्रिपुर सुंदरी- भारतीय राज्य त्रिपुरा के उदरपुर के निकट राधाकिशोरपुर गाँव के माताबाढ़ी पर्वत शिखर पर माता का दायां पैर गिरा था। इसकी शक्ति है त्रिपुर सुंदरी और भैरव को त्रिपुरेश कहते हैं।15. चट्टल- भवानी- बांग्लादेश में चिट्टागौंग (चटगाँव) जिला के सीताकुंड स्टेशन के निकट चंद्रनाथ पर्वत शिखर पर छत्राल (चट्टल या चहल) में माता की दायीं भुजा गिरी थी। इसकी शक्ति भवानी है और भैरव को चंद्रशेखर कहते हैं। 16. त्रिस्रोता- भ्रामरी- भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी के बोडा मंडल के सालबाढ़ी ग्राम स्थित त्रिस्रोत स्थान पर माता का बायाँ पैर गिरा था। इसकी शक्ति है भ्रामरी और भैरव को अंबर और भैरवेश्वर कहते हैं। 17. कामगिरि- कामाख्या- भारतीय राज्य असम के गुवाहाटी जिले के कामगिरि क्षेत्र में स्थित नीलांचल पर्वत के कामाख्या स्थान पर माता का योनि भाग गिरा था। इसकी शक्ति है कामाख्या और भैरव को उमानंद कहते हैं।18. प्रयाग- ललिता- भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर (प्रयाग) के संगम तट पर माता की हाथ की ऊँगली गिरी थी। इसकी शक्ति है ललिता और भैरव को भव कहते हैं। 19. जयंती- जयंती- बांग्लादेश के सिलहट जिले के जयंतिया परगना के भोरभोग गाँव कालाजोर के खासी पर्वत पर जयंती मंदिर जहां माता की बायीं जंघा गिरी थी। इसकी शक्ति है जयंती और भैरव को क्रमदीश्वर कहते हैं। 20. युगाद्या- भूतधात्री- पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले के खीरग्राम स्थित जुगाड्या (युगाद्या) स्थान पर माता के दाएँ पैर का अँगूठा गिरा था। इसकी शक्ति है भूतधात्री और भैरव को क्षीर खंडक कहते हैं। 21. कालीपीठ- कालिका- कोलकाता के कालीघाट में माता के बाएँ पैर का अंगूठा गिरा था। इसकी शक्ति है कालिका और भैरव को नकुशील कहते हैं। 22. किरीट- विमला (भुवनेशी)- पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिला के लालबाग कोर्ट रोड स्टेशन के किरीटकोण ग्राम के पास माता का मुकुट गिरा था। इसकी शक्ति है विमला और भैरव को संवर्त्त कहते हैं। 23. वाराणसी- विशालाक्षी- उत्तरप्रदेश के काशी में मणिकर्णिका घाट पर माता के कान के मणिजड़ीत कुंडल गिरे थे। इसकी शक्ति है विशालाक्षी मणिकर्णी और भैरव को काल भैरव कहते हैं। 24. कन्याश्रम- सर्वाणी- कन्याश्रम में माता का पृष्ठ भाग गिरा था। इसकी शक्ति है सर्वाणी और भैरव को निमिष कहते हैं। 25. कुरुक्षेत्र- सावित्री- हरियाणा के कुरुक्षेत्र में माता की एड़ी (गुल्फ) गिरी थी। इसकी शक्ति है सावित्री और भैरव है स्थाणु। 26. मणिदेविक- गायत्री- अजमेर के निकट पुष्कर के मणिबन्ध स्थान के गायत्री पर्वत पर दो मणिबंध गिरे थे। इसकी शक्ति है गायत्री और भैरव को सर्वानंद कहते हैं। 27. श्रीशैल- महालक्ष्मी- बांग्लादेश के सिलहट जिले के उत्तर-पूर्व में जैनपुर गाँव के पास शैल नामक स्थान पर माता का गला (ग्रीवा) गिरा था। इसकी शक्ति है महालक्ष्मी और भैरव को शम्बरानंद कहते हैं। 28. कांची- देवगर्भा- पश्चिम बंगाल के बीरभूमी जिला के बोलारपुर स्टेशन के उत्तर पूर्व स्थित कोपई नदी तट पर कांची नामक स्थान पर माता की अस्थि गिरी थी। इसकी शक्ति है देवगर्भा और भैरव को रुरु कहते हैं। 29. कालमाधव- देवी काली- मध्यप्रदेश के अमरकंटक के कालमाधव स्थित शोन नदी तट के पास माता का बायाँ नितंब गिरा था जहाँ एक गुफा है। इसकी शक्ति है काली और भैरव को असितांग कहते हैं। 30. शोणदेश- नर्मदा (शोणाक्षी)- मध्यप्रदेश के अमरकंटक स्थित नर्मदा के उद्गम पर शोणदेश स्थान पर माता का दायाँ नितंब गिरा था। इसकी शक्ति है नर्मदा और भैरव को भद्रसेन कहते हैं। 31. रामगिरि- शिवानी- उत्तरप्रदेश के झाँसी-मणिकपुर रेलवे स्टेशन चित्रकूट के पास रामगिरि स्थान पर माता का दायाँ वक्ष गिरा था। इसकी शक्ति है शिवानी और भैरव को चंड कहते हैं। 32. वृंदावन- उमा- उत्तरप्रदेश के मथुरा के निकट वृंदावन के भूतेश्वर स्थान पर माता के गुच्छ और चूड़ामणि गिरे थे। इसकी शक्ति है उमा और भैरव को भूतेश कहते हैं। 33. शुचि- नारायणी- तमिलनाडु के कन्याकुमारी-तिरुवनंतपुरम मार्ग पर शुचितीर्थम शिव मंदिर है, जहाँ पर माता की ऊपरी दंत (ऊर्ध्वदंत) गिरे थे। इसकी शक्ति है नारायणी और भैरव को संहार कहते हैं। 34. पंचसागर- वाराही- पंचसागर (अज्ञात स्थान) में माता की निचले दंत (अधोदंत) गिरे थे। इसकी शक्ति है वराही और भैरव को महारुद्र कहते हैं। 35. करतोयातट- अपर्णा- बांग्लादेश के शेरपुर बागुरा स्टेशन से 28 किमी दूर भवानीपुर गाँव के पार करतोया तट स्थान पर माता की पायल (तल्प) गिरी थी। इसकी शक्ति है अर्पण और भैरव को वामन कहते हैं। 36. श्री पर्वत- श्री सुंदरी- कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र के पर्वत पर माता के दाएं पैर की पायल गिरी थी। दूसरी मान्यता अनुसार आंध्रप्रदेश के कुर्नूल जिले के श्रीशैलम स्थान पर दक्षिण गुल्फ अर्थात दाएँ पैर की एड़ी गिरी थी। इसकी शक्ति है श्रीसुंदरी और भैरव को सुंदरानंद कहते हैं। 37. विभाष- कपालिनी- पश्चिम बंगाल के जिला पूर्वी मेदिनीपुर के पास तामलुक स्थित विभाष स्थान पर माता की बायीं एड़ी गिरी थी। इसकी शक्ति है कपालिनी (भीमरूप) और भैरव को शर्वानंद कहते हैं। 38. प्रभास- चंद्रभागा- गुजरात के जूनागढ़ जिले में स्थित सोमनाथ मंदिर के निकट वेरावल स्टेशन से 4 किमी प्रभास क्षेत्र में माता का उदर गिरा था। इसकी शक्ति है चंद्रभागा और भैरव को वक्रतुंड कहते हैं। 39. भैरवपर्वत- अवंती- मध्यप्रदेश के उज्जैन नगर में शिप्रा नदी के तट के पास भैरव पर्वत पर माता के ओष्ठ गिरे थे। इसकी शक्ति है अवंति और भैरव को लम्बकर्ण कहते हैं। 40. जनस्थान- भ्रामरी- महाराष्ट्र के नासिक नगर स्थित गोदावरी नदी घाटी स्थित जनस्थान पर माता की ठोड़ी गिरी थी। इसकी शक्ति है भ्रामरी और भैरव है विकृताक्ष। 41. सर्वशैल स्थान- आंध्रप्रदेश के राजामुंद्री क्षेत्र स्थित गोदावरी नदी के तट पर कोटिलिंगेश्वर मंदिर के पास सर्वशैल स्थान पर माता के वाम गंड (गाल) गिरे थे। इसकी शक्ति है राकिनी और भैरव को वत्सनाभम कहते हैं’ 42.गोदावरीतीर:- यहाँ माता के दक्षिण गंड गिरे थे। इसकी शक्ति है विश्वेश्वरी और भैरव को दंडपाणि कहते हैं। 43. रत्नावली- कुमारी- बंगाल के हुगली जिले के खानाकुल-कृष्णानगर मार्ग पर रत्नावली स्थित रत्नाकर नदी के तट पर माता का दायाँ स्कंध गिरा था। इसकी शक्ति है कुमारी और भैरव को शिव कहते हैं। 44.मिथिला- उमा (महादेवी)- भारत-नेपाल सीमा पर जनकपुर रेलवे स्टेशन के निकट मिथिला में माता का बायां स्कंध गिरा था। इसकी शक्ति है उमा और भैरव को महोदर कहते हैं। 45.नलहाटी- कालिका तारापीठ- पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के नलहाटि स्टेशन के निकट नलहाटी में माता के पैर की हड्डी गिरी थी। इसकी शक्ति है कालिका देवी और भैरव को योगेश कहते हैं। 46. कर्णाट- जयदुर्गा- कर्नाट (अज्ञात स्थान) में माता के दोनों कान गिरे थे। इसकी शक्ति है जयदुर्गा और भैरव को अभिरु कहते हैं। 47. वक्रेश्वर- महिषमर्दिनी- पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के दुबराजपुर स्टेशन से सात किमी दूर वक्रेश्वर में पापहर नदी के तट पर माता का भ्रूमध्य (मन:) गिरा था। इसकी शक्ति है महिषमर्दिनी और भैरव को वक्रनाथ कहते हैं। 48. यशोर- यशोरेश्वरी- बांग्लादेश के खुलना जिला के ईश्वरीपुर के यशोर स्थान पर माता के हाथ और पैर गिरे (पाणिपद्म) थे। इसकी शक्ति है यशोरेश्वरी और भैरव को चण्ड कहते हैं। 49. अट्टाहास- फुल्लरा- पश्चिम बंगला के लाभपुर स्टेशन से दो किमी दूर अट्टहास स्थान पर माता के ओष्ठ गिरे थे। इसकी शक्ति है फुल्लरा और भैरव को विश्वेश कहते हैं। 50. नंदीपूर- नंदिनी- पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के सैंथिया रेलवे स्टेशन नंदीपुर स्थित चारदीवारी में बरगद के वृक्ष के समीप माता का गले का हार गिरा था। इसकी शक्ति है नंदिनी और भैरव को नंदिकेश्वर कहते हैं। 51. लंका- इंद्राक्षी- श्रीलंका में संभवत: त्रिंकोमाली में माता की पायल गिरी थी (त्रिंकोमाली में प्रसिद्ध त्रिकोणेश्वर मंदिर के निकट)। इसकी शक्ति है इंद्राक्षी और भैरव को राक्षसेश्वर कहते हैं। 52. विराट- अंबिका- विराट (अज्ञात स्थान) में पैर की अँगुली गिरी थी। इसकी शक्ति है अंबिका और भैरव को अमृत कहते हैं। नोट : इसके अलावा पटना-गया के इलाके में कहीं मगध शक्तिपीठ माना जाता है। 53. मगध- सर्वानन्दकरी- मगध में दाएँ पैर की जंघा गिरी थी। इसकी शक्ति है सर्वानंदकरी और भैरव को व्योम केश कहते हैं।
महान व्यक्ति – भगवान राम, कृष्ण, भीष्म, अर्जुन, हनुमान, बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, कबीर, गुरु नानक, शिवाजी, महाराणा प्रताप जैसे ऐतिहासिक और पौराणिक हस्तियाँ। धार्मिक ग्रंथ – चारों वेद, पुराण, उपनिषद, जैन आगम, त्रिपिटक, गुरु ग्रंथ साहिब। आदर्श नारियाँ – अरुंधती, अनुसूया, सावित्री, जानकी, सीता, सती, अहिल्या, लक्ष्मीबाई, चेन्नम्मा। संस्कृति और विज्ञान – आर्यभट्ट, चरवाक, पाणिनि, पतंजलि जैसे ऋषि और वैज्ञानिक।
भारत की सांस्कृतिक विरासत, विविधता और एकता का अनुभव कराना।हर भारतीय में अपने देश के प्रति गर्व और स्वाभिमान जगाना । सभी भारतीयों को एक राष्ट्र और एक संस्कृति के धागे में पिरोना। संक्षेप में, ऐसे स्त्रोत भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ते है, जिसमें हर घटक को सम्मान मिलता है और राष्ट्र के प्रति एकात्म (एक होने) की भावना पैदा होती है।






