अखंड भारत का इतिहास
सतीश शर्मा 
अखंड भारत की सीमाएं केवल भौगोलिक भू-भाग तक सीमित नहीं थीं । इसकी संस्कृति, धर्म और दर्शन (विशेषकर हिंदू और बौद्ध धर्म) ने दक्षिण-पूर्व एशिया में गहरा प्रभाव छोड़ा । कंबोडिया का अंकोरवाट मंदिर और इंडोनेशिया की संस्कृति (जहाँ आज भी रामायण का मंचन होता है) इसी सांस्कृतिक अखंडता के जीवंत प्रमाण हैं । अखंड भारत एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संकल्पना है जिसके अनुसार आधुनिक युग के अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका और तिब्बत कभी भारतीय उपमहाद्वीप के अभिन्न हिस्से थे। यह क्षेत्र अपनी साझा वैदिक, बौद्ध और सनातन संस्कृति से सदियों तक एकजुट रहा है।
शास्त्रों, पुराणों और महाभारत में इस भू-भाग को जंबू द्वीप और भारतवर्ष के नाम से जाना जाता था । जैसा हम संकल्प मंत्र में बोलते है
“ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः, ॐ अद्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे पुण्यक्षेत्रे…
समय-समय पर मौर्य और गुप्त जैसे विशाल साम्राज्यों ने इसे राजनीतिक रूप से भी एक सूत्र में पिरोया। मौर्य साम्राज्य (लगभग 321 ईसा पूर्व) चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य के नेतृत्व में भारत की सीमाएं पश्चिम में ईरान (कंधार और हेरात) से लेकर पूर्व में म्यांमार तक फैली हुई थीं। सम्राट अशोक के शासनकाल में अखंड साम्राज्य का क्षेत्रफल लगभग 50 लाख वर्ग किलोमीटर तक पहुँच गया था।
विदेशी आक्रमणों और औपनिवेशिक नीतियों ने समय-समय पर इस विशाल भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्र को खंडित किया। ईरानी और यूनानी आक्रमण: प्राचीन काल में सिकंदर के आक्रमण के बाद से ही उत्तर-पश्चिमी सीमाओं पर बाहरी प्रभाव पड़ने लगे थे।
ईसा पूर्व (BCE – Before Common Era) का काल प्राचीन भारत का वह स्वर्णिम समय था, जब भारत में विशाल साम्राज्यों की नींव पड़ी और राजनीतिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक विकास हुआ। इस काल में कई महान हिन्दू शासकों ने अखंड भारत (जिसमें आज का भारत, पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान शामिल थे) का निर्माण किया।आइए, ईसा पूर्व के प्रमुख भारतीय शासकों और उनके वंशों के इतिहास को विस्तार से समझें:१. हर्यंक वंश (६ठी शताब्दी ईसा पूर्व)राजा बिम्बिसार (५४३–४९२ ईसा पूर्व): ये हर्यंक वंश के संस्थापक थे। बिम्बिसार ने अपनी राजधानी राजगृह (वर्तमान बिहार) को बनाया। उन्होंने कौशल और वैशाली जैसे पड़ोसी राज्यों के साथ वैवाहिक संबंध बनाकर अपनी शक्ति बढ़ाई और मगध साम्राज्य की नींव रखी।अजातशत्रु (४९२–४६० ईसा पूर्व): बिम्बिसार के पुत्र अजातशत्रु ने पिता की नीति को आगे बढ़ाया और पाटलिपुत्र को एक मजबूत किले के रूप में विकसित किया।२. नंद वंश (३४५–३२२ ईसा पूर्व)महापद्मनंद: नंद वंश के सबसे शक्तिशाली और पहले महान साम्राज्य निर्माता सम्राट थे। इन्हें ‘सर्व-क्षत्रान्तक’ (सभी क्षत्रियों का नाश करने वाला) भी कहा गया, क्योंकि इन्होंने कई छोटे क्षेत्रीय राज्यों को जीतकर एक विशाल साम्राज्य बनाया।घनानंद: ये नंद वंश के अंतिम शासक थे। इनके समय में सिकंदर (Alexander) का आक्रमण हुआ था। घनानंद एक क्रूर लेकिन अत्यधिक धनवान राजा थे, जिन्हें बाद में चंद्रगुप्त मौर्य ने पराजित किया।३. मौर्य साम्राज्य (३२२–१८५ ईसा पूर्व)यह प्राचीन भारत का सबसे बड़ा और शक्तिशाली हिन्दू-बौद्ध साम्राज्य था।सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य: आचार्य चाणक्य (कौटिल्य) की मदद से चंद्रगुप्त मौर्य ने नंद वंश के राजा घनानंद को हराया और ३२२ ईसा पूर्व में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। इन्होंने उत्तर-पश्चिम में सिकंदर के सेनापति सेल्युकस निकेटर को भी हराया था।सम्राट अशोक महान: चंद्रगुप्त मौर्य के पोते अशोक ने अपने साम्राज्य का विस्तार किया। कलिंग युद्ध (२६१ ईसा पूर्व) के बाद उनका हृदय परिवर्तन हो गया और उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर ‘बौद्ध धर्म’ अपना लिया। अशोक ने पूरे भारत में स्तूप, शिलालेख और जनकल्याणकारी कार्य करवाए।४. शुंग और कण्व वंश (१८५–३० ईसा पूर्व)पुष्यमित्र शुंग: मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद, १८५ ईसा पूर्व में पुष्यमित्र शुंग ने शुंग वंश की स्थापना की। इन्होंने यवनों (ग्रीक आक्रमणकारियों) को पीछे खदेड़ा और वैदिक धर्म तथा संस्कृति का पुनरुद्धार किया। इसके बाद कण्व वंश (७५–३० ईसा पूर्व) का शासन आया।५. सातवाहन वंश (प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व)राजा सिमुक: दक्षिण भारत और मध्य भारत में सातवाहन वंश की स्थापना की। इस वंश के राजाओं ने दक्कन (Deccan) के पठार पर लंबे समय तक शासन किया और विदेशी आक्रमणकारियों को भारत में घुसने से रोका।ईसा पूर्व के इतिहास का महत्व (सरल शब्दों में)महाजनपदों का उदय: ईसा पूर्व की छठी सदी (६०० ईसा पूर्व) में भारत १६ बड़े राज्यों या ‘महाजनपदों’ में बंटा हुआ था। इनमें मगध सबसे शक्तिशाली बनकर उभरा।धर्म और दर्शन: इसी काल में भगवान महावीर (जैन धर्म) और गौतम बुद्ध (बौद्ध धर्म) ने अहिंसा और सत्य का संदेश दिया।ग्रंथों की रचना: महान ग्रंथ जैसे उपनिषद, और बाद में रामायण और महाभारत, इसी प्राचीन काल की देन हैं।
001 से 208 ईस्वी तक के काल में भारत में कुषाण और सातवाहन जैसे प्रमुख राजवंशों का शासन था। यह समय भारत के व्यापार, कला और सांस्कृतिक विस्तार का एक महत्वपूर्ण स्वर्ण युग था।इस अवधि के मुख्य हिन्दू/भारतीय सम्राटों और राजाओं का विवरण इस प्रकार है:1. सातवाहन वंश (दक्कन और मध्य भारत)यह प्राचीन भारत का एक बहुत शक्तिशाली राजवंश था।गौतमीपुत्र सातकर्णी (लगभग 106 से 130 ईस्वी): इन्हें सातवाहन वंश का सबसे महान राजा माना जाता है। नासिक अभिलेखों के अनुसार, उन्होंने विदेशी शासकों (शक और पहलव) को हराया और अपने साम्राज्य का विस्तार महाराष्ट्र से लेकर आंध्र प्रदेश और गुजरात तक किया।वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी (लगभग 130 से 154 ईस्वी): गौतमीपुत्र के बाद उनके पुत्र शासक बने। इनके समय में व्यापार बहुत फला-फूला।2. शक या पश्चिमी क्षत्रपये मूल रूप से विदेशी थे, लेकिन भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म को अपना लिया था और यहाँ के शासक बन गए थे।रुद्रदामन प्रथम (लगभग 130 से 150 ईस्वी): यह इस वंश के सबसे प्रतापी राजा थे। जूनागढ़ के शिलालेख (पत्थर पर लिखे संदेश) के अनुसार, उन्होंने सातवाहन राजाओं को हराया और सुदर्शन झील की मरम्मत करवाई।3. कुषाण वंश (उत्तर-पश्चिम और उत्तरी भारत)कुषाण मध्य एशिया से आए थे, लेकिन बाद में वे भारत के मुख्य शासक बन गए।कनिष्क (लगभग 127 से 150 ईस्वी): कुषाण वंश का सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली राजा। उन्होंने अपनी राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) और मथुरा बनाई। उन्होंने रेशम मार्ग (Silk Road) के व्यापार को बहुत बढ़ाया और बौद्ध धर्म को काफी संरक्षण दिया।हुविष्क और वासुदेव (प्रथम): कनिष्क के बाद, हुविष्क और फिर वासुदेव ने कुषाण साम्राज्य को 200 ईस्वी के बाद तक संभाला।4. संगम काल (दक्षिण भारत)सुदूर दक्षिण (तमिलनाडु) में चोल, चेर और पांड्य राजाओं का शासन था, जो कला, साहित्य और समुद्री व्यापार के लिए जाने जाते थे।इस समय करिकाल चोल जैसे राजाओं ने दक्षिण में हिन्दू मंदिरों और तमिल साहित्य को बढ़ावा दिया।
ई.स. 200 से 700 का कालखंड भारत के इतिहास में ‘शास्त्रीय युग’ (Classical Age) माना जाता है। इस दौरान देश में महान हिन्दू साम्राज्यों का उदय हुआ, कला और विज्ञान का विकास हुआ, और मंदिरों की वास्तुकला (Architecture) की शुरुआत हुई। इस सुनहरे दौर ने भारत को ज्ञान और शक्ति के मामले में दुनिया के शीर्ष पर पहुंचाया。इस काल के प्रमुख हिन्दू शासकों और राजवंशों का संक्षिप्त इतिहास निम्नलिखित है:1. गुप्त साम्राज्य (लगभग 320 ईस्वी – 550 ईस्वी)गुप्त वंश को भारतीय इतिहास का ‘स्वर्ण युग’ कहा जाता है। इस काल में गणित, खगोल विज्ञान, साहित्य और कला ने अभूतपूर्व प्रगति की।समुद्रगुप्त: इन्हें भारत का नेपोलियन कहा जाता है। उन्होंने अपनी विजय यात्रा में उत्तर और दक्षिण के कई राजाओं को हराया。चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य): इन्होंने शकों (विदेशी आक्रमणकारियों) को पराजित कर उज्जैन को अपनी राजधानी बनाया। इनके दरबार में कालिदास जैसे ‘नवरत्न’ रहते थे।2. वाकाटक राजवंश (लगभग 3ठी सदी – 5वीं सदी)यह मध्य भारत और दक्कन में एक शक्तिशाली राजवंश था।प्रवरसेन प्रथम: इन्होंने चार अश्वमेघ यज्ञ किए और साम्राज्य का विस्तार नर्मदा से दक्षिण तक किया。 इन्होंने उत्तर भारत के गुप्त वंश के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करके अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की।3. पल्लव राजवंश (लगभग 300 ईस्वी – 9वीं सदी)यह दक्षिण भारत का एक महान राजवंश था, जिसने कांचीपुरम को अपनी राजधानी बनाया。नरसिंहवर्मन प्रथम: इन्हें ‘महामल्ल’ भी कहा जाता था। इन्होंने चालुक्यों की राजधानी वातापी पर विजय प्राप्त की。 इनके समय में ही महाबलीपुरम (मामल्लापुरम) के प्रसिद्ध पंच रथ मंदिर ( monolithic temples) और शोर मंदिर का निर्माण हुआ जो आज यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर हैं。4. चालुक्य वंश (6ठी सदी – 12वीं सदी)इन्होंने कर्नाटक और महाराष्ट्र के क्षेत्रों में शासन किया।पुलकेसी द्वितीय: यह इस वंश के सबसे प्रतापी राजा थे。 इन्होंने उत्तर भारत के शक्तिशाली सम्राट हर्षवर्धन को नर्मदा नदी के तट पर हराया था। पुलकेसी द्वितीय ने दक्षिण में पल्लवों से भी कड़ा मुकाबला किया।5. वर्धन साम्राज्य (6ठी सदी – 7वीं सदी)गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद उत्तर भारत में इस वंश ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।सम्राट हर्षवर्धन: इन्होंने अपनी राजधानी थानेश्वर (हरियाणा) से कन्नौज स्थानांतरित की। हर्ष एक महान योद्धा होने के साथ-साथ अत्यंत दानवीर भी थे। वे हर पांच वर्ष में प्रयाग (इलाहाबाद) में अपनी पूरी संपत्ति दान कर देते थे।6. इस काल की प्रमुख विशेषताएँ:विज्ञान और गणित: इसी काल में महान गणितज्ञ आर्यभट्ट ने शून्य की खोज की और पृथ्वी गोल है, यह सिद्ध किया।साहित्य: संस्कृत भाषा का सबसे अधिक विकास इसी काल में हुआ। रामायण और महाभारत को अंतिम रूप इसी दौरान दिया गया।मंदिर निर्माण: पत्थरों को तराश कर मंदिर बनाने की भव्य शुरुआत इसी काल की देन है।यह युग न केवल युद्ध कौशल, बल्कि संस्कृति और धर्म के प्रसार के लिए भी इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।
७०० से १२०० ईस्वी (प्रारंभिक मध्यकाल) का समय भारतीय इतिहास में राजपूत काल कहलाता है। इस युग में भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंटा था, लेकिन इन हिन्दू शासकों ने कला, साहित्य और मंदिरों का निर्माण कराया । इन राजाओं ने अरब और तुर्क आक्रमणकारियों को रोककर देश की रक्षा की । इस काल के प्रमुख हिन्दू शासकों और राजवंशों का विवरण नीचे दिया गया है:१. उत्तर भारत के प्रमुख राजवंशगुर्जर-प्रतिहार वंश (८वीं से १०वीं शताब्दी) इस वंश के राजाओं ने भारत के उत्तर-पश्चिम में एक मजबूत साम्राज्य बनाया। नागभट्ट प्रथम ने अरब के आक्रमणकारियों को पीछे धकेला था । मिहिर भोज इस वंश के सबसे शक्तिशाली और प्रतापी राजा थे।पाल वंश (८वीं से १२वीं शताब्दी) पूर्वी भारत (बंगाल, बिहार) पर राज करने वाले इस वंश के राजा धर्मपाल और देवपाल थे। इन्होंने शिक्षा को बढ़ावा दिया और ‘विक्रमशिला विश्वविद्यालय’ बनवाया ।चौहान या चाहमान वंश (११वीं से १२वीं शताब्दी) राजस्थान और दिल्ली पर शासन करने वाले इस वंश के सबसे प्रसिद्ध राजा पृथ्वीराज चौहान थे। उन्होंने तराइन के युद्ध (११९१ ई.) में विदेशी आक्रमणकारी मोहम्मद गोरी को करारी शिकस्त दी थी । चन्देल वंश (९वीं से १३वीं शताब्दी): बुंदेलखंड (मध्य प्रदेश) पर शासन करने वाले इस वंश ने विश्व प्रसिद्ध खजुराहो के मंदिरों और कंदरिया महादेव मंदिर का निर्माण कराया।गहड़वाल वंश (११वीं से १२वीं शताब्दी): कन्नौज और वाराणसी के इस वंश के सबसे प्रतापी राजा जयचंद थे। दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंशराष्ट्रकूट वंश (८वीं से १०वीं शताब्दी): इन्होंने दक्कन (महाराष्ट्र) पर शासन किया । राजा कृष्ण प्रथम ने एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर (एक ही पत्थर को तराश कर बनाया गया) का निर्माण करवाया ।चोल वंश (९वीं से १३वीं शताब्दी): दक्षिण भारत का यह सबसे शक्तिशाली राजवंश था। राजा राज चोल और राजेंद्र चोल ने अपनी नौसेना के बल पर श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया तक अपने राज्य का विस्तार किया। उन्होंने तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर बनवाया । चालुक्य वंश (६वीं से १२वीं शताब्दी): कर्नाटक और बादामी क्षेत्र पर राज करने वाले इस वंश ने वातापी और पट्टादकल के शानदार मंदिरों का निर्माण कराया ।३. मध्य और पश्चिम भारत के राजवंशपरमार वंश (९वीं से १४वीं शताब्दी): मालवा (मध्य प्रदेश) के परमार शासकों में राजा भोज सबसे प्रसिद्ध थे। वे बहुत बड़े विद्वान और कला प्रेमी थे। उन्होंने धार में ‘भोजशाला’ (सरस्वती मंदिर) और भोजपुर मंदिर बनवाया । सोलंकी या चालुक्य वंश (१०वीं से १३वीं शताब्दी): गुजरात के इस वंश के समय में प्रसिद्ध मोढेरा का सूर्य मंदिर और दिलवाड़ा के जैन मंदिर बनाए गए।गुहिल या सिसोदिया वंश (८वीं शताब्दी से आगे): राजस्थान (मेवाड़) के इस वंश के संस्थापक बप्पा रावल थे, जिन्होंने अरब आक्रमणकारियों को सिंध से खदेड़ दिया था । विशेषता और पतन:इस काल के दौरान भारत में भव्य मंदिरों और मूर्तिकला का बहुत विकास हुआ। लेकिन, आपस में लड़ने के कारण ये राजा संगठित नहीं रह सके। १२वीं शताब्दी के अंत में तुर्क आक्रमणों (जैसे मोहम्मद गोरी) के बाद उत्तर भारत में हिन्दू सत्ता कमजोर होने लगी और दिल्ली सल्तनत की नींव पड़ी।
600 ईसा पूर्व का काल भारतीय इतिहास का एक महान परिवर्तनकारी युग था। इस समय भारत में कबीलाई जनपदों का स्थान बड़े और संगठित राज्यों (सोलह महाजनपदों) ने ले लिया। इसी काल में लोहे के व्यापक प्रयोग, एक विस्तृत अर्थव्यवस्था और बौद्ध-जैन धर्मों के उदय ने भारतीय संस्कृति की मजबूत नींव रखी।
सोलह महाजनपद उत्तर भारत में कुल 16 बड़े राज्यों (महाजनपदों) का उदय हुआ, जिनमें मगध, कौशल, वत्स, और अवंती सबसे शक्तिशाली थे।शासन प्रणाली: इन राज्यों में दो प्रकार की शासन व्यवस्थाएं थीं— राजतंत्र (राजा का शासन) और गणतंत्र (जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की सभा)। उदाहरण के लिए, वैज्जी/लिच्छवि एक प्रमुख गणतंत्र थे। इस काल में कौशाम्बी, श्रावस्ती, चंपा और राजगृह जैसे बड़े शहर विकसित हुए। बौद्ध और जैन धर्म का उदय कर्मकांडों और जटिल वैदिक वर्ण व्यवस्था के विरोध में इस युग में दो महान सुधारकों का जन्म हुआ गौतम बुद्ध (563–483 ईसा पूर्व) इन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना की और अहिंसा तथा मध्यम मार्ग का उपदेश दिया।महावीर स्वामी (540–468 ईसा पूर्व) जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर, जिन्होंने जैन धर्म के दर्शन (जैसे त्रिरत्न और पंचमहाव्रत) को जन-जन तक पहुँचाया। मगध का उत्कर्ष गंगा और सोन नदी के संगम पर स्थित मगध ने अपना राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित किया। बिम्बिसार और अजातशत्रु जैसे महत्वाकांक्षी राजाओं ने इसे एक विशाल साम्राज्य में बदल दिया। इसकी सामरिक स्थिति, उपजाऊ भूमि, और लोहे की खदानों के कारण यह सबसे शक्तिशाली बन गया।
उत्तर भारत में लोहे का व्यापक उपयोग शुरू हो गया, जिससे जंगलों को साफ करना और खेती में लोहे के औजारों का इस्तेमाल आसान हो गया।व्यापार और मुद्रा: कृषि में अतिरिक्त उपज होने से व्यापार में भारी वृद्धि हुई। लेनदेन के लिए पहली बार ‘आहत सिक्कों’ का प्रयोग शुरू हुआ। भारत की पश्चिमोत्तर सीमा पर फारस के हखामनी साम्राज्य के शासक सायरस और डेरियस प्रथम ने आक्रमण किए, जिससे भारत का मध्य पूर्व के साथ व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ा।
मौर्य वंश (लगभग 322-185 ईसा पूर्व) चंद्रगुप्त मौर्य ने इस वंश की स्थापना की। उनके पोते सम्राट अशोक भारत के सबसे महान सम्राटों में से एक थे, जिनका साम्राज्य लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर फैला था । गुप्त साम्राज्य (लगभग 319-550 ईस्वी) इस काल को भारत का ‘स्वर्ण युग’ कहा जाता है। समुद्रगुप्त (जिन्हें ‘भारत का नेपोलियन’ भी कहा जाता है) और चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) के समय कला, विज्ञान और साहित्य का बहुत विकास हुआ।
सम्राट हर्षवर्धन के शासन (जो 606 से 647 ईस्वी तक रहा) के बाद, उत्तर भारत राजनीतिक रूप से छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गया। 700 ईस्वी का भारत ‘प्रारंभिक मध्यकाल’ का प्रवेश द्वार था, जहाँ गुप्त साम्राज्य का स्वर्ण युग समाप्त हो चुका था और हर्षवर्धन के बाद देश कई क्षेत्रीय राज्यों में बंट गया था। यह काल उत्तर में गुर्जर-प्रतिहार, पूर्व में पाल, और दक्षिण में पल्लव और चालुक्य राजवंशों के बीच सत्ता संघर्ष, शानदार मंदिर वास्तुकला और नए क्षेत्रीय संस्कृतियों के उदय के लिए जाना जाता है। दक्षिण में, पल्लव राजवंश जिसकी राजधानी कांचीपुरम थी और चालुक्य वंश जिन्होंने बाद में राष्ट्रकूटों को रास्ता दिया के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही थी। यह समय दक्षिण में द्रविड़ वास्तुकला और महाबलीपुरम के रथ मंदिरों के निर्माण का उत्कर्ष काल था। इस काल में सामंतवाद की जड़ें मजबूत होने लगी थीं। भूमि अनुदान के माध्यम से क्षेत्रीय जमींदार और योद्धा वर्ग जिन्हें बाद में राजपूत कहा गया शक्तिशाली हो गए। 700 ईस्वी के आसपास भारतीय उपमहाद्वीप में क्षेत्रीय भाषाओं, साहित्य और कला का तेजी से विकास हुआ। मंदिर निर्माण की नागर, द्रविड़ और बेसर शैलियों को इस समय में विशेष पहचान मिली।
1200 से 1526 ईस्वी तक का समय भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण दौर है। इस काल में उत्तर भारत में दिल्ली सल्तनत का शासन था, वहीं दक्षिण भारत में शक्तिशाली विजयन साम्राज्य और पूर्वोत्तर में अहोम साम्राज्य जैसे कई हिन्दू राजवंशों ने अपनी स्वतंत्रता और संस्कृति को बनाए रखा और फला-फूल। विजयनगर साम्राज्य (1336–1526 और आगे) इस साम्राज्य की नींव 1336 ई. में हरिहर और बुक्का नाम के दो भाइयों ने रखी थी । यह दक्षिण भारत में तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित था। कृष्णदेव राय (1509–1530) इस वंश के सबसे महान राजा थे। उन्होंने कला, साहित्य और कृषि को बहुत बढ़ावा दिया。उनके समय में हंपी इसकी राजधानी थी और यह शहर अपनी भव्य वास्तुकला, मंदिरों और समृद्ध व्यापार के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध था।
अहोम साम्राज्य, असम (1228–1526 और आगे 1228 ईस्वी में चाउलुंग सुकाफा ने ब्रह्मपुत्र घाटी में अहोम राज्य की स्थापना की थी इन शासकों ने पूर्वोत्तर भारत में एक मजबूत और स्वतंत्र राज्य बनाया। उन्होंने अपनी युद्ध-नीति और कृषि (चावल की खेती) में नई तकनीकों से स्थानीय लोगों को एकजुट किया । इन्होंने बाहरी सल्तनत के कई हमलों का सफलतापूर्वक मुकाबला किया।
मेवाड़ और राजपूत राज्य इस दौरान राजस्थान में कई हिन्दू राजाओं ने दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों के सामने घुटने नहीं टेके। 13वीं और 14वीं शताब्दी में मेवाड़ के राणा हम्मीर और राणा कुंभा जैसे राजाओं ने अपने राज्य का विस्तार किया और कला-संस्कृति को ऊंचाइयों पर पहुंचाया।
दक्षिण और मध्य भारत के अन्य राज्य होयसल साम्राज्य (कर्नाटक) 1346 ई. तक इनका शासन रहा। वे अपनी बेजोड़ मंदिर वास्तुकला (जैसे बेलूर और हेलेबिड के मंदिर) के लिए जाने जाते हैं।
काकतीय वंश (आंध्र प्रदेश) 1323 ई. तक इन्होंने शासन किया। ये अपनी सैन्य शक्ति और प्रसिद्ध वारंगल के किले के लिए जाने जाते हैं।
गज़पति साम्राज्य (ओडिशा) 15वीं और 16वीं शताब्दी में इस शक्तिशाली हिन्दू साम्राज्य ने तटवर्ती इलाकों पर शासन किया और कला को संरक्षण दिया। इन हिन्दू साम्राज्यों ने मध्यकाल में अपनी विशिष्ट संस्कृति, धर्म और शासन व्यवस्था को सुरक्षित रखा। इस काल की सबसे बड़ी झलक आज भी विजयनगर की हंपी और असम की ऐतिहासिक विरासतों में देखी जा सकती है।
712 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में सिंध पर पहला अरब आक्रमण हुआ। हालांकि इस हमले से कोई बड़ा स्थायी साम्राज्य स्थापित नहीं हुआ, लेकिन इसने मध्यकालीन भारतीय इतिहास की दिशा में एक नए चरण की शुरुआत की। मध्यकाल में अरब और तुर्क आक्रमणों तथा मुगल साम्राज्य के विस्तार के परिणामस्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप में राजनीतिक व सांस्कृतिक बदलाव आए।
12वीं शताब्दी के अंत में मुहम्मद गोरी के अभियानों के बाद भारत में एक स्थायी इस्लामी साम्राज्य की नींव पड़ी। गुलाम या ममलूक वंश (1206-1290) कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा स्थापित। खिलजी वंश (1290-1320) जलालुद्दीन खिलजी और अलाउद्दीन खिलजी का साम्राज्य विस्तार। तुगलक वंश (1320-1414) मुहम्मद बिन तुगलक और फिरोज शाह तुगलक का काल।सैय्यद वंश (1414-1451) खिज्र खान द्वारा स्थापित।लोदी वंश (1451-1526) बहलूल लोदी से लेकर इब्राहिम लोदी तक, जो पहले अफगान शासक थे। 1526 ईस्वी: बाबर द्वारा मुग़ल साम्राज्य की स्थापना (पानीपत का प्रथम युद्ध)। 1556 ईस्वी: पानीपत का दूसरा युद्ध – अकबर और हेमू के बीच, अकबर की जीत।
1600 ईस्वी: ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ प्रथम द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापार की अनुमति , 1674 ईस्वी: छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा मराठा साम्राज्य की स्थापना।,1757 ईस्वी: प्लासी का युद्ध – अंग्रेजों की बंगाल के नवाब पर ऐतिहासिक जीत।,1764 ईस्वी: बक्सर का युद्ध – अंग्रेजों का भारत पर राजनीतिक शिकंजा मजबूत हुआ। 1857 ईस्वी: 1857 का विद्रोह (प्रथम स्वतंत्रता संग्राम)। कंपनी का शासन समाप्त। 1885 ईस्वी: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना। 1905 ईस्वी: बंगाल का विभाजन। 1919 ईस्वी: जलियांवाला बाग हत्याकांड और रॉलेट एक्ट। 1920 ईस्वी: महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन की शुरुआत। 1930 ईस्वी: सविनय अवज्ञा आंदोलन (दांडी यात्रा / नमक सत्याग्रह) 1942 ईस्वी: भारत छोड़ो आंदोलन का आरंभ। 15 अगस्त 1947 ईस्वी: भारत की स्वतंत्रता और देश का विभाजन।
मुगलों ने भारत पर 1526 से 1857 तक, लगभग 330 वर्षों तक शासन किया था। इस साम्राज्य की स्थापना बाबर ने पानीपत की पहली लड़ाई में इब्राहिम लोदी को हराकर की थी। यह शासन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम और अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के निष्कासन के साथ समाप्त हुआ ।
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश राज ने अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के तहत 19वीं और 20वीं शताब्दी में कई क्षेत्रों को अलग कर दिया -1893 डूरंड लाइन के जरिए अफ़ग़ानिस्तान को भारत से अलग कर दिया गया।1937 म्यांमार (बर्मा) को भारत से प्रशासनिक रूप से अलग कर दिया गया। स्वतंत्रता के समय धर्म के आधार पर भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ, जिसके बाद 1971 में पाकिस्तान से कटकर बांग्लादेश का उदय हुआ।







