अर्जुनविषाद योग

“अर्जुनविषाद योग” 

सतीश शर्मा

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अध्याय, जिसे ‘अर्जुनविषादयोग’ कहा जाता है, अर्जुन विषाद योग पूरी गीता की पृष्ठभूमि और आधारशिला है। इस अध्याय में कुल 47 श्लोक हैं, जो कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में उपजे एक महान मानसिक और नैतिक संकट को दर्शाते हैं। यह अध्याय केवल एक ऐतिहासिक युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि मानव मन के भीतर चलने वाले अंतर्द्वंद का जीवंत चित्रण है। अध्याय की शुरुआत हस्तिनापुर के नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र के प्रश्न से होती है, जो अपने सारथी संजय से पूछते हैं –

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ 

धृतराष्ट्र पूछते हैं कि धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया ? यहाँ ‘धर्मक्षेत्र’ शब्द दर्शाता है कि यह लड़ाई केवल भूमि के टुकड़े के लिए नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच थी । संजय अपनी दिव्य दृष्टि से युद्ध के मैदान का हाल सुनाना शुरू करते हैं। शुरुआती श्लोकों में दुर्योधन की कूटनीति और भय का वर्णन है, साधारणतः जो अधर्म के साथ होते हैं उनको भय  रहता ही है। दुर्योधन सेनापति पितामह भीष्म व गुरु द्रोणाचार्य के पास जाकर उनको पांडवों की सेना की व्यवस्था दिखाता है। अपनी सेना  और पांडवों की सेना की तुलनात्मक अध्ययन करते हुए उनसे चर्चा करता है ।  इसके बाद, कौरव सेना के सेनापति पितामह भीष्म सिंह की दहाड़ के समान अपना शंख बजाकर युद्ध की घोषणा करते हैं। प्रत्युत्तर में, भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन अपने दिव्य शंख (पांचजन्य और देवदत्त) बजाते हैं, जिससे अधर्म के पक्ष में खड़े कौरवों के हृदय दहल जाते हैं।

अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि उनके रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा किया जाए ताकि वे देख सकें कि उन्हें किन-किन से युद्ध करना है । जब श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ को भीष्म और द्रोणाचार्य के सामने खड़ा करते हैं, तो अर्जुन के सामने एक अत्यंत कठिन परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है । जैसे ही अर्जुन दोनों ओर अपने सगे-संबंधियों, पिताओं, पिताओं के भाइयों, गुरुओं, मामाओं, भाइयों, पुत्रों और मित्रों को देखते हैं, उनका हृदय गहरे शोक और करुणा से भर जाता है।

सगे-संबंधियों को मारने की कल्पना मात्र से अर्जुन का शरीर कांपने लगता है, उनका मुख सूख जाता है और उनके हाथ से प्रसिद्ध ‘गांडीव’ धनुष गिर जाता है। वे तर्क देते हैं कि अपनों को मारकर मिलने वाले राज्य-सुख या विजय का कोई मूल्य नहीं है। अर्जुन को कुल-नाश (परिवार के विनाश) और उसके कारण समाज में फैलने वाले अधर्म का डर सताने लगता है। वे युद्ध के मैदान में हताश होकर रथ के पिछले हिस्से में बैठ जाते हैं। पहले अध्याय  का आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व है मानव मन जो हमे विचलित कर्ता है तो यह अध्याय हमे शोक से ज्ञान की ओर ले जाता है । कुरुक्षेत्र का मैदान हमारा जीवन है, जहाँ पांडव हमारी अच्छी प्रवृत्तियों (गुणों) के और कौरव हमारी बुरी आदतों (विकारों) के प्रतीक हैं। अर्जुन का यह ‘विषाद’ (दुख) साधारण अवसाद नहीं है, बल्कि एक आध्यात्मिक खोज की शुरुआत है। जब तक मनुष्य अपनी सीमाओं को पहचानकर व्याकुल नहीं होता, तब तक वह गुरु (श्रीकृष्ण) की शरण में नहीं जाता। 

पहला अध्याय हमे सिखाता है कि जब हमारी बुद्धि मोह, ममता और ‘मैं और मेरा’ की भावना से घिर जाती है, तो हम कर्तव्य पथ से भटक जाते हैं। तो निर्णय लेने में असमर्थ हो जाते है । अर्जुनविषादयोग’ हमें सिखाता है कि जीवन की विकट परिस्थितियों में मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्यों से भागना कायरता है। यह अध्याय मनुष्य को उसकी कमजोरियों का आईना दिखाता है की हमारे मन मे जो कमजोरियाँ  होती है वह हमारी कायरता है । अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के सामने युद्ध न करने के लिए जो सबसे बड़ा सामाजिक और नैतिक तर्क दिया, उसे ‘कुल-नाश का तर्क’ कहा जाता है। अर्जुन का मानना था कि इस युद्ध में दोनों तरफ उनके अपने ही परिवार के लोग खड़े हैं। यदि वे मारे गए, तो संपूर्ण समाज की व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी। 

पहले हम अर्जुन के इन तर्कों को विस्तार से समझते  हैं –

अर्जुन का पहला तर्क था कि युद्ध में परिवार के मुख्य पुरुषों (बुजुर्गों और संरक्षकों) के मारे जाने पर कुल की प्राचीन और पवित्र परंपराएं (कुल-धर्म) समाप्त हो जाती हैं। जब परिवार के मार्गदर्शक ही नहीं रहेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को अच्छे संस्कार और धर्म की शिक्षा कौन देगा? इसके परिणामस्वरूप, बचे हुए परिवार में अधर्म और अनैतिकता तेजी से पैर पसार लेती है। कुल में अधर्म फैलने का सबसे पहला और बुरा प्रभाव परिवार की महिलाओं पर पड़ता है। अर्जुन कहते हैं कि पुरुषों के अभाव और असुरक्षा के कारण कुल की स्त्रियां दूषित (पथभ्रष्ट) हो जाती हैं। समाज में नैतिक मूल्यों की कमी के कारण महिलाओं का शोषण और चरित्र हनन होने की संभावना बढ़ जाती है।

जब स्त्रियां दूषित या धर्म से विमुख हो जाती हैं, तो समाज में ‘वर्णसंकर’ संतानें पैदा होती हैं। वर्णसंकर का अर्थ है ऐसी संतानें जो बिना किसी नैतिक मूल्य, संस्कार और सामाजिक नियमों के पैदा होती हैं। ऐसी भावी पीढ़ी समाज में केवल अराजकता, अपराध और पतन को बढ़ावा देती है। अर्जुन एक गहरा धार्मिक तर्क देते हुए कहते हैं कि कुल का नाश होने पर पूर्वजों (पितरों) को दिया जाने वाला पिंड और जल ये कहे की श्राद्ध कर्म बंद हो जाता है। सनातन परंपरा में माना जाता है कि पुत्र द्वारा किया गया श्राद्ध पितरों को उच्च लोकों में स्थान दिलाता है। जब कुल की परंपरा ही नष्ट हो जाएगी, तो श्राद्ध करने वाला कोई नहीं बचेगा, जिससे पितरों का भी पतन हो जाता है और पूरा परिवार पाप का भागी बनता है। इन वर्णसंकर दोषों के कारण केवल उस विशिष्ट परिवार का ही नहीं, बल्कि पूरी जाति (समाज) और राष्ट्र का सनातन धर्म नष्ट हो जाता है। समाज की नींव हिला देने वाले इस विनाश के कारण पूरी सामाजिक व्यवस्था, मर्यादा और कानून का अंत हो जाता है।

अपने तर्कों का उपसंहार करते हुए अर्जुन कहते हैं कि उन्होंने आचार्यों से सुना है कि जो लोग कुल-धर्म का नाश करते हैं, उन्हें और उनके पूरे परिवार को अनिश्चित काल तक नरक में वास करना पड़ता है। इसलिए, ऐसे घोर पाप को करके राज्य-सुख भोगने से बेहतर है कि मैं युद्ध न करूँ और कौरव मुझे निहत्था ही मार दें। अर्जुन के यह तर्क सतही तौर पर बहुत ही धार्मिक, व्यावहारिक और दयालुता से भरे लगते हैं। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण अगले ही अध्याय (द्वितीय अध्याय) में इन तर्कों को ‘मूर्खतापूर्ण’ और ‘मोह जनित’ बताते हैं।

श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि अर्जुन का यह ज्ञान असल में ‘मोह’ से पैदा हुआ है, विवेक से नहीं। यदि सामने कोई और शत्रु होता, तो अर्जुन को कुल-नाश की याद नहीं आती। दुर्योधन और कौरवों ने समाज में पहले ही अधर्म फैला रखा था। ऐसे आततायियों को दंड न देना समाज के लिए और भी बड़े विनाश का कारण बनता।  अगले अध्यायों में भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य ज्ञान  के माध्यम से उन कमजोरियों को दूर किया जा सके।

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