“एक असाधरण व्यक्तित्व – नरेंद्र दास दामोदर मोदी”
मनमीत सोनी 
इस 17 सितंबर को यह व्यक्ति छिहत्तर वर्ष का हो जाएगा। यह व्यक्ति पिछले चार दशकों से खुली राजनीति में है। जिनमें से लगभग 26 वर्ष बिलकुल सत्ता की राजनीति की है और कभी मुँह की नहीं खाई। कुछ तो बात होगी। कोई तो करिश्मा होगा। उन आलोचकों की तरह मूर्खता की भाषा मत बोलिये कि दो धर्मों को लड़वा के वोट लिए / झूठ बोलता है / फेंकता है / मीडिया मैनेज करता है। सारी बातों को पीछे धकेल दीजिये। आप विपक्षी या विरोधी हैं, तब भी “सब्जेक्टिव अप्रोच” से इस व्यक्ति को देखिये।
सब कुछ खिलाफ़ था। यह व्यक्ति गुजरात की राजनीति में भी उपेक्षित था। एक “चांस” की बात है कि भारतीय जनता पार्टी ने वहाँ भेजा। उसके बाद 26 वर्ष से यह व्यक्ति या तो गुजरात की सत्ता में रहा या केंद्र की सत्ता में।
कितने ही नेता लाइन में थे। आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, राजनाथ, वेंकय्या, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी। लेकिन यह व्यक्ति सब को पीछे छोड़ देता है। इसके भीतर कितनी तेज़ ललक रही होगी। कितनी ऊर्जा। कितना जोश। कितनी चतुराई। कितना धैर्य। यह व्यक्ति कितनी जल्दी परिस्थिति में ढल जाता है। इसे कड़क / रिजिड कहने वाले सचमुच भोले हैं। यह व्यक्ति राम मंदिर के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाता है। 370 हटाता है। तीन तलाक़ हटाता है। मिलिट्री ओपरेशन करवाता है। लेकिन जब हालात हाथों से बाहर निकलते हैं तो रिवर्स गियर ले लेता है। कितनी चतुराई से किसान आंदोलन निपटाया। कितनी योजना से जंतर मंतर को उसी ज़हर से काटा, जो ज़हर बोया जा रहा था।
पिचहत्तर वर्ष की आयु में अचानक इंस्टाग्राम पर आ जाना। यह जानते हुए भी कि जेन ज़ी को कंविन्स करना आसान नहीं, कोशिश करना। अपने मंत्री का इस्तीफ़ा ले लेना। बिलकुल चुप हो जाना। फिर एक दिन कुछ बोल कर यह बता देना कि मुझे सब जानकारी है।
यह व्यक्ति कितना संवाद कुशल है। बारह बरस से केंद्रीय सत्ता का केंद्र। और चाहे तो आगे भी रह सकता है। यानी ऐसी कोई गोपन तकनीक है ज़रूर कि सत्ता के सारे समीकरण साध लेता है। यह तकनीक नेहरू के पास भी थी लेकिन इतनी “वाईब्रैंट” नहीं। अटल के पास भी। लेकिन उनका समय दूसरा था। यह व्यक्ति “प्रिसिजन” से वार करता है। इस व्यक्ति को कैमरे के एंगल से लेकर पूजा में बैठने के ढंग तक, सब कुछ पर “कमांड” है।
यह कला ऐसे ही नहीं आती। मैं तो सबसे कुछ न कुछ सीखता हूँ। मुझे कम बैक करना नरेन्द्र मोदी ने ही सिखाया। अपने विरोधी को चुभना मगर उसे पूरी तरह लाचार कर देना। झटके नहीं हलाल का इस्तेमाल करना।
मीडिया – संस्थान – संसद – मन्त्रिमंडल – विधायक – जनता – अंतर्राष्ट्रीय राजनीति तक, सब कुछ पर एक साथ नज़र। यदि कभी मुँह की खानी पड़ भी जाए तो हाथों हाथ सम्भल जाना। यह मैंनेजमेंट आसान नहीं है। इसके लिए आपके पास ईश्वर – प्रदत्त – प्रतिभा होनी चाहिए।
सोने पर सुहागा राहुल जैसा ढीला और बेहद गैर-ज़िम्मेदार और मरा हुआ विपक्ष।
फिर कहता हूँ। इस व्यक्ति को एक “इंस्टिट्यूट” की तरह देखिये। 2002 से 2026 तक यह व्यक्ति भारत में सबसे अधिक चर्चा में रहा है। मुझे लगता है 2032 तक रहेगा। कहने में क्या जाता है कि जब तक जीवित रहेगा, आकर्षण और समाचारों का केंद्र रहेगा।
ऐसा चक्रवर्ती भाग्य मैंने तो किसी का नहीं देखा।
हाँ, बहुत कमियाँ हैं। कहीं – कहीं अलोकतांत्रिक हो जाना। अटेंशन सीकर होना। बहुत महत्वाकांक्षी होना। बहुत बड़े दावे करना। लेकिन फिर वही बात कि परफेक्ट कोई नहीं होता। मोदी भी नहीं है। लेकिन परफेक्ट होने का पीछा ज़रूर किया जा सकता है।
यदि मैं राहुल गाँधी होता तो मन ही मन मोदी को गुरु मान लेता। हार मान लेता कि भाई हमसे आप नहीं सध सकते। लेकिन हार मानने के बाद मैं मोदी की तकनीक अपना कर ही मोदी की जगह पहुँचता। तू – तड़ाक नहीं करता। मेलोनी – फेलोनी वाली सस्ती नौटंकी नहीं करता। टी-शर्ट पहनकर तफ़री नहीं करता। संसद को गंभीरता से लेता और अठारह घंटे नहीं तो बारह घंटे ज़रूर काम करता।
मोदी से ही सीखता कि इतने बड़े जन-समुदाय को कैसे अपने पीछे किया जाता है। मोदी से ही सीखता कि कब, क्या, कैसे कौन-सी बात बोलनी है। क्या बोलनी है और क्या छुपा जानी है।
मोदी भारतीय राजनीति के लिए ही बने हैं। मोदी के भीतर “प्रेडिक्शन” और “जजमेंट” और “टाइमिंग” जैसी तीनों चीज़ें हैं।
मैं बहुत सामान्य व्यक्ति हूँ। एक प्राइवेट कॉलेज में लेक्चरर। थोड़ी – बहुत कविता भी कर लेता हूँ। लेकिन मैं जब भी किसी मुसीबत में फंस जाता हूँ तो यही सोचता हूँ कि मोदी यहाँ होते तो क्या करते? क्या वह “रियेक्ट” करते ? या, चुप रह जाते? या, ध्यान ही नहीं देते!
बहुत सारी बातें हैं।
आप मुझे भक्त / अंधभक्त या “अंडभक्त” भी कह सकते हैं। लेकिन हर पीढ़ी का एक हीरो होता है। मेरा भी है। मैं इसे आपसे क्यों छुपाऊँ। छुपाकर बेईमानी ही करूँगा।
आप भले ही मोदी से नफ़रत करें, लेकिन लक्ष्मण भी तो रावण के पास कुछ सीखने ही गए थे। यदि आप मोदी को विश्वामित्र समझकर राम की तरह नहीं जा सकते तो रावण समझकर लक्ष्मण की तरह ही चले जाइये।
आपका क़द छोटा नहीं हो जाएगा। उलटे यह विनम्रता आपको लाभ ही देगी।
दोस्तो!
अपने “रिसीविंग हैंड” को हमेशा खुला रखिये। यह जीवन को बहुत सरल और सुविधाजनक बनाता है और मुश्किलों से उबार भी लेता है। बाक़ी आप पर। हाँ, मुझे मोदीजी को केवल मोदी कहना पड़ा, इसके लिए क्षमा! यह केवल समझाने के लिए था। और आख़िरी बात। अमित शाह जैसा एक दोस्त ज़रूर बनाइये। दोस्ती कीजिये। दोस्ती निभाइये। आख़िरी हद तक निभाइये। मैंने अपने जीवन में मोदी और शाह से बढ़कर दोस्त नहीं देखे। यह दोनों तो ख़ून के रिश्ते को भी पीछे छोड़ चुके।








Modiji Jindabad tha aur Jindabad rahega Modiji ne apna jivan Bharat Mata ko samarpit kiya hai Bina kisi lobh lalach ke Ishwar inko lambi aayu de jisse Bharat Mata ko bharastacharyo se bacha sake
Very nice analysis