‘सांख्ययोग’
सतीश शर्मा 
श्रीमद्भगवद्गीता का द्वितीय अध्याय, जिसे ‘सांख्ययोग’ कहा जाता है, पूरी गीता का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है। इसे गीता का ‘सार’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने उन सभी मुख्य सिद्धांतों की नींव रख दी है, जिन्हें आगे के 16 अध्यायों में विस्तार से समझाया गया है। इसमें कुल 72 श्लोक हैं।
अध्याय की शुरुआत में संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि अर्जुन शोक से व्याकुल हैं। तब श्रीकृष्ण अर्जुन को झिझक छोड़ कायरता त्यागने को कहते हैं। यहाँ अर्जुन को अपनी भूल का अहसास होता है और वे श्लोक 7 में स्वयं को श्रीकृष्ण का शिष्य घोषित करते हुए पूर्ण समर्पण कर देते हैं।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वाम् धर्मसम्मूढचेताः ।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥ (श्लोक 7)
अर्थ: “मैं मोह रूपी कमजोरी के कारण अपने कर्तव्य को भूल गया हूँ। आप मुझे निश्चित रूप से बताएं कि मेरे लिए क्या कल्याणकारी है। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में हूँ, मुझे शिक्षा दें।”
जब अर्जुन शिष्य बनकर मार्गदर्शन मांगते हैं, तब श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए उनका अज्ञान दूर करने के लिए परम ज्ञान देना शुरू करते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन के ‘कुल-नाश’ और ‘मृत्यु’ के डर को मिटाने के लिए आत्मा की अमरता का सिद्धांत समझाते हैं।
आत्मा कभी नहीं मरती, जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर प्राप्त करती है (श्लोक 22)।
आत्मा अपरिवर्तनीय है, इसे न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल गीला कर सकता है और न वायु सुखा सकती है (श्लोक 23)। मृत्यु केवल शरीर की है जन्म लेने वाले की मृत्यु और मरने वाले का जन्म निश्चित है, इसलिए जो अवश्यंभावी है (जिसे बदला नहीं जा सकता), उसके लिए शोक करना व्यर्थ है।
आत्मा के ज्ञान के बाद, श्रीकृष्ण अर्जुन को व्यावहारिक और सामाजिक स्तर पर समझाते हैं। वे कहते हैं कि एक क्षत्रिय (योद्धा) के लिए धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करने से बढ़कर कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है। यदि अर्जुन युद्ध से भागते हैं, तो संसार उन्हें कायर कहेगा और उनकी अपकीर्ति (बदनामी) होगी, जो मृत्यु से भी बदतर है। यदि वे युद्ध में मारे गए तो स्वर्ग प्राप्त करेंगे, और यदि जीत गए तो पृथ्वी का राज्य भोगेंगे। इसलिए उन्हें लाभ-हानि, जय-पराजय और सुख-दुख को समान मानकर युद्ध करना चाहिए। इसी अध्याय में गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक आता है, जहाँ श्रीकृष्ण निष्काम कर्मयोग (बिना फल की इच्छा के कर्तव्य करना) का उपदेश देते हैं:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ (श्लोक 47)
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फलों पर कभी नहीं। इसलिए कर्म के फल की इच्छा से काम मत करो और न ही कर्म न करने (अकर्मण्यता) में तुम्हारी आसक्ति हो।
श्रीकृष्ण कहते हैं—”समत्वं योग उच्यते” (सुख-दुख, सफलता-विफलता में मन का एक समान रहना ही योग है) और “योगः कर्मसु कौशलम्” (कर्मों को कुशलतापूर्वक और अनासक्त होकर करना ही योग है)।
अध्याय के अंतिम भाग में, अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि जो व्यक्ति पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर चुका है और जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है (स्थितप्रज्ञ), वह कैसा होता है? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? ऐसा व्यक्ति मन में उठने वाली सभी भौतिक इच्छाओं को त्याग देता है और अपनी आत्मा में ही संतुष्ट रहता है। जैसे एक कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही स्थितप्रज्ञ पुरुष अपनी इंद्रियों को वासनाओं और विषयों से खींच लेता है। वह न तो सुख मिलने पर बहुत खुश होता है और न ही दुख आने पर घबराता है। वह क्रोध, भय और आसक्ति से मुक्त होता है। अंत में श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा शांत व्यक्ति ही ‘ब्राह्मी स्थिति’ (परमात्मा की अवस्था) को प्राप्त करता है और अंत समय में मोक्ष का अधिकारी बनता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने ‘स्थितप्रज्ञ’ (जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी हो) बनने के जो उपाय बताए हैं, वे आज की आधुनिक और तनावपूर्ण जीवनशैली में भी पूरी तरह व्यावहारिक और उपयोगी हैं।यदि हम आज के संदर्भ में देखें, तो एक आम इंसान निम्नलिखित 5 व्यावहारिक उपायों को अपनाकर ‘स्थितप्रज्ञ’ या मानसिक रूप से मजबूत बन सकता है।
इंद्रिय संयम और डिजिटल डिटॉक्स,गीता के श्लोक 58 में श्रीकृष्ण कछुए का उदाहरण देते हैं:
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
जैसे कछुआ खतरा देखकर अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही हमें अपनी इंद्रियों को भटकाने वाले विषयों से दूर रखना चाहिए। इसका मतलब है ‘डिजिटल डिटॉक्स’। सोशल मीडिया, अनावश्यक नोटिफिकेशन और नकारात्मक खबरों से अपनी आंखों और कानों को बचाना। जब जरूरत न हो, तो ध्यान को बाहरी दुनिया से हटाकर खुद पर केंद्रित करना।
इच्छाओं और अपेक्षाओं का प्रबंधन,श्लोक 55 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब मनुष्य मन में उठने वाली सभी कामनाओं (इच्छाओं) को त्यागकर अपनी आत्मा में ही संतुष्ट रहने लगता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है। हमारी मानसिक अशांति का सबसे बड़ा कारण है—दूसरों से उम्मीदें रखना।
आज के समय में: खुश रहने के लिए बाहरी चीजों (महंगी कार, गैजेट्स या दूसरों की तारीफ) पर निर्भर रहना बंद करें। अपनी खुशी को आंतरिक बनाएं। ‘जितना मिला है, उसमें संतुष्ट रहना’ और ‘जो नहीं है, उसके लिए परेशान न होना’ ही इसका व्यावहारिक रूप है।
‘अटैचमेंट’ और ‘डिटैचमेंट’ का संतुलन (बुद्धि का जाल) श्लोक 62-63 में श्रीकृष्ण मानसिक पतन का एक चक्र बताते हैं । चीजों के बारे में लगातार सोचने से आसक्ति होती है → आसक्ति से काम पैदा होता है → इच्छा पूरी न होने पर क्रोध आता है → क्रोध से सम्मोह होता है → इससे स्मृति भ्रम होता है और अंत में बुद्धि का नाश हो जाता है।
किसी भी काम को पूरी शिद्दत से करें, लेकिन उसके परिणाम से खुद को इतना न बांधें कि असफलता मिलने पर आप टूट जाएं। ऑफिस के प्रोजेक्ट या किसी रिश्ते में अपना 100% दें, लेकिन मानसिक रूप से यह स्वीकार करने के लिए तैयार रहें कि सब कुछ आपके नियंत्रण में नहीं है। इसे कॉर्पोरेट भाषा में भी कहा जाता है।
सुख-दुख में समभाव श्लोक 56 में कहा गया है कि दुखों के आने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जिसकी लालसा खत्म हो जाती है, और जो भय तथा क्रोध से मुक्त है, वह स्थिर बुद्धि है।
जीवन के उतार-चढ़ाव को ‘स्थायी’ न मानें। जब बहुत बड़ी सफलता मिले तो अहंकार में न आएं, और जब कोई बड़ा नुकसान या असफलता मिले तो डिप्रेशन में न जाएं। खुद को याद दिलाएं—”यह वक्त भी गुजर जाएगा।” अपनी भावनाओं को काबू में रखने के लिए रोजाना कम से कम 10-15 मिनट मेडीटेशन (ध्यान) या प्राणायाम करें।
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कभी भी दूसरों को देखकर प्रतिक्रिया नहीं करता, बल्कि वह सोच-समझकर कदम उठाता है । हर दिन के अंत में 5 मिनट अकेले बैठें और अपने दिनभर के व्यवहार का विश्लेषण करें। खुद से पूछें—”आज किस बात पर मुझे सबसे ज्यादा गुस्सा आया? क्या मेरा गुस्सा होना जायज था? क्या मैं अपनी भावनाओं के बहकावे में आ गया था?” यह आत्म-जागरूकता ही आपको धीरे-धीरे स्थिर बुद्धि बनाती है।
स्थितप्रज्ञ बनने का मतलब संसार को छोड़ना नहीं है, बल्कि संसार में रहते हुए भी एक कमल के पत्ते की तरह रहना है, जो पानी में रहकर भी पानी से गीला नहीं होता। यदि प्रथम अध्याय जीवन की ‘समस्या’ (विषाद) को दिखाता है, तो द्वितीय अध्याय उसका ‘समाधान’ (ज्ञान और कर्म) देता है। यह हमें सिखाता है कि जब भी हम जीवन के कुरुक्षेत्र में भ्रमित हों, तो हमें अपने शाश्वत स्वरूप (आत्मा) को पहचानकर, फल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ना चाहिए।
अज्ञान को दूर भगाएं ज्ञान का उजाला करें। गरीब बेसहारा बच्चों कि शिक्षा हेतु सहायता करने के लिए निम्नलिखित खाते में दान करें।
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