धर्म और पूजा-पद्धतियां अलग हो सकती हैं,
लेकिन पूरी इंसानियत एक ही है
सतीश शर्मा 
न्यू यॉर्क का *मैडिसन स्क्वायर गार्डन* है। वहां 29 अगस्त 2026 को RSS शताब्दी वर्ष के तहत एक विश्व – एक मानवता उत्सव’ “Universal Oneness Celebration / One World – One Humanity” कार्यक्रम हुआ था, जिसे American Hindus for Engagement & Dialogue (AHEAD) ने आयोजित किया था।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत जी के न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में उनका भाषण हुआ जिसमें भारतीय समुदाय के अलावा 30 देशों के, 16 विभिन्न धर्मो के प्रतिनिधि भी सम्मिलित हुए थे। 180 से अधिक आध्यात्मिक / धार्मिक गुरु, आचार्य थे। विश्व के अनेकों चैनलों के पत्रकार व हजारों सोशल मीडिया अकाउंट्स से यह कार्यक्रम लाइव प्रसारित हो रहा था।
अपने उद्बोधन मे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत जी ने भारत के सदियों पुराने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सोच का परोक्ष रूप से जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म और पूजा-पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन पूरी इंसानियत एक ही है। उनके संबोधन से पहले उनकी तस्वीरें टाइम्स स्क्वायर के मुख्य बिलबोर्ड पर दिखाई गईं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जी ने कहा कि अगर कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं है। हिंदुत्व का मतलब मुसलमानों को भारत से बाहर निकालना नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत जी ने 2018 मे हुई दिल्ली के विज्ञान भवन वाली व्याख्यान श्रृंखला का जिक्र किया, “कुछ मुस्लिम भाइयों ने मुझसे पूछा था कि आप हिंदू संगठन हैं और हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं, तो हमारा क्या होगा? क्या आप हमें देश से बाहर निकाल देंगे? उस वक्त मैंने उनसे कहा था कि नहीं, यह हिंदुत्व नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूजा-पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन अंतिम सत्य मानवता ही है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत जी ने कहा की मैं कोई धार्मिक विद्वान या धार्मिक गुरु नहीं हूं। मैं एक ऐसे समाज में काम करता हूं, जो पारंपरिक रूप से यह मानता है कि धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, पर मानवता एक ही है। सत्य एक ही है और मानवता उसी सत्य की उपज है।
उन्होंने आगे कहा, “विश्व में दो प्रकार के लोग हैं। एक कहते हैं, ‘जियो और जीने दो’ । दूसरे प्रकार के लोग हैं जो कहते हैं, ‘मात्र उन्हीं को जीने का अधिकार हैं, जो हमारी बात मानते हैं। हम उन्ही की रक्षा करेंगे, जो हमारे मत को मानेगा’ । यह दूसरे प्रकार के लोग असुर (राक्षस) श्रेणी में आते हैं, और पहले प्रकार के लोग देव कहलाते हैं।
दुनिया में कई धर्म हैं और वे मुख्य रूप से रीति-रिवाजों से जाने जाते हैं। लेकिन धर्म का असली उद्देश्य हमें सत्य की ओर ले जाना है। यदि हम केवल मार्ग (उंगली) पर अटके रहेंगे, तो लक्ष्य (प्रकाश) को कभी नहीं देख पाएंगे। परम सत्य को पाने के कई मार्ग हो सकते हैं। जिसे आज का विज्ञान चेतना कहता है। रास्ते अलग होना स्वाभाविक है, लेकिन वे सभी एक दिव्यता की ओर ले जाते हैं।संघ प्रमुख ने दुनिया में मौजूद विभिन्न धर्मों और उनकी धार्मिक परंपराओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में धर्मों को काफी हद तक उनके रीति रिवाजों और अनुष्ठानो के आधार पर परिभाषित किया जाता है। उन्होंने माना कि धार्मिक अनुशासन और अनुष्ठान किसी व्यक्ति के लिए आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम हो सकते हैं।भागवत ने कहा- ‘सत्य एक है और मानवता उसी सत्य की उपज है, इसलिए इंसानियत भी एक है।’
अगर आप खुद को हिंदू कहना चाहते हैं तो आपको यह मानना होगा कि सभी रास्ते एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं और हर इंसान की गरिमा है। इंसानों के बीच कोई भेदभाव नहीं है। अगर हम समाज को लगातार शिक्षित नहीं करते हैं, तो उसमें विचलन पैदा होने लगता है और इतिहास के दौरान किसी तरह ऐसा पहले भी हुआ है । उन्होंने कहा कि भारत के डीएनए में विविधता और एकता दोनों शामिल हैं, और विविधता ही हमारी वास्तविक ताकत है। अमेरिकी नागरिकों और प्रवासियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जो लोग अमेरिका में रहते और कमाते हैं, उन्हें अपनी कर्मभूमि के प्रति वफादार रहना चाहिए। जब हम अमेरिका या यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका कहते हैं तुम एक शब्द की अक्सर चर्चा होती है वह बहुलताबाद और जहां भारत कहते तो एक वाक्यांश की चर्चा होती है विविधता में एकता। भारत के लिए विविधता और एकता उसके डीएनए में है। राष्ट्रीय सूचना के संचालक ने कहा विवेकानंद जी की बात का उल्लेख करते हुए कहा कि हर राष्ट्र का एक मिशन होता है जिसे उसे पूरा करना होता है और एक नियति होती है जिसे सरकार करना होता है। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि भौतिक सुख और धन संपत्ति से इंसान को कभी भी स्थाई संतोष नहीं मिल सकता स्थाई खुशी केवल इंसानों के बीच में गहरी आंतरिक और आध्यात्मिक जुड़ा को समझने में आती है इंसान की अपनी पहचान इससे नहीं होती तो उसने कितना कमाया बल्कि इससे होती है कि उसने समाज को कितना लौट आया मनुष्य को दूसरों के कल्याण और प्रकृति की रक्षा के लिए भी जीना चाहिए लेकिन केवल उसके उपयोग के लिए। भारत यह आपकी, आपके पुरखों की जन्मभूमि हैं। इसलिए भारत के लिए कुछ करना संभव हैं तो अवश्य करें, किंतु आपकी जन्मभूमि आपसे अपेक्षा करती है कि जिन मूल्यों को लेकर आपका, आपके पुरखों का जीवन बना हैं, उन मूल्यों के साथ आप अपनी कर्मभूमि में कार्य करें।
व्यक्ति, समाज और पर्यावरण, इन तीनों को एक साथ आगे बढ़ना होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि व्यक्ति को दबाकर समाज का विकास हो, या समाज को दबाकर व्यक्ति का। मनुष्य को जीवन के द्वंद्वों को संतुलित करना सीखना होगा। भौतिक सुख यह स्थाई सुख या समाधान नहीं हैं’, इसको विस्तार से बताते हुए आपने रामकृष्ण मिशन के बोधवाक्य ‘आत्मनोः मोक्षार्थ’ का विश्लेषण किया। स्वयं की, अपनी आत्मा का मोक्ष कब होगा? ‘जगत् हितायच’ में। अर्थात विश्व कल्याण में। ‘मैं आप में हूं, और आप मेरे में’। यही हैं। हमारा दायित्व है कि इस ज्ञान को हम विश्व में फैलाएं।
29 अगस्त को न्यूयॉर्क के मैनहटन स्थित मेडिसन स्क्वायर गार्डन में 11 सितंबर 1893 के स्वामी विवेकानंद जी के शिकागो भाषण का स्मरण करा रहा था। पूरे उद्बोधन का निष्कर्ष है
सर्वे भवन्तु सुखिन,सर्वे सन्तु निरामया ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु,मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्:।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्ति ।।







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