पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए किए जाते है श्राद्ध
सतीश शर्मा 
श्राद्ध पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए किया जाता है। सनातन धर्म में प्रत्येक व्यक्ति पर 3 ऋण माने गए हैं – देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। हमारा शरीर, नाम, संस्कार हमें पितरों से मिला है, इसलिए उनके ऋण से मुक्त होने और उनका सम्मान करने के लिए श्राद्ध किया जाता है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद भी आत्मा का सूक्ष्म संबंध परिवार से रहता है। श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से उन्हें तृप्ति मिलती है और उनकी आगे की यात्रा सुगम होती है। यह सिर्फ पूजा नहीं है, अपने पूर्वजों को याद करने का दिन है। नई पीढ़ी को बताया जाता है कि हम किनके वंश से हैं, उन्होंने क्या किया। इससे परिवार में जुड़ाव बना रहता है। गरुड़ पुराण और अन्य ग्रंथों में कहा गया है कि पितृ पक्ष में पितर धरती पर आते हैं। इस दौरान किया गया दान, ब्राह्मण भोजन और जरूरतमंदों को दिया गया अन्न सीधे उन तक पहुंचता है और बदले में वे परिवार को आशीर्वाद देते हैं।श्राद्ध पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए किया जाता है।
आश्विन कृष्णपक्ष ‘पितृपक्ष’ कहलाता है। इस पक्ष में जो व्यक्ति अपने दिवंगत पूर्वजों की मृत्यु तिथि अनुसार तिल, कुशा, 4 पुष्पाक्षत, गंगाजल सहित उन्हें पिण्डदान व तर्पणादि करने के मं. बाद ब्राह्मणों को यथाशक्ति भोजन, फल-वस्त्र, दक्षिणादि सहित गु. संकल्पपूर्वक दान करता है, उसके पितर संतृप्त होकर जातक को स्वास्थ्य, आरोग्य, दीर्घायु, धन-सुख सम्पदा का आशीर्वाद प्रदान करते हैं-
‘आयु पुत्रान् यशः स्वर्ग-कीर्ति पुष्टिं बलं श्रियम् । पशून् सौख्यं धन-धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात् ।।’
जो व्यक्ति 2 जान-बूझकर पितृश्राद्ध कर्म नहीं करता, वह पितरों द्वारा शापित होकर अनेक प्रकार के मानसिक व शारीरिक कष्टों से पीड़ित रहता है।
मान्यता है कि तर्पण और पिंडदान से पितरों को भूख-प्यास से मुक्ति मिलती है, उनकी आत्मा को शांति मिलती है और वे प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। घर में बार-बार क्लेश, कामों में रुकावट, संतान संबंधी बाधा को पितृ दोष से जोड़ा जाता है। श्राद्ध से इसमें शांति मिलती है, ऐसा माना जाता है। जब पितर तृप्त होते हैं तो परिवार में स्वास्थ्य, समृद्धि और एकता बनी रहती है। हमने अपने पूर्वजों के लिए अपना कर्तव्य पूरा किया, इस भाव से मन में संतोष और अपराध-बोध खत्म होता है। श्राद्ध के नाम पर किया गया अन्नदान, वस्त्रदान और ब्राह्मण भोजन एक तरह का सामाजिक दान है। आपके माध्यम से अन्न जरूरतमंद तक पहुंचता है। श्राद्ध कर्ज चुकाने जैसा नहीं, धन्यवाद कहने जैसा है। जैसा हम अपने माता-पिता की सेवा जीते-जी करते हैं, वैसे ही जाने के बाद उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना ही श्राद्ध है। इसीलिए हर साल भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या तक के 16 दिनों को पितृ पक्ष कहते हैं और इस दौरान अपनी तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है।
मान्यता है कि पितृपक्ष में सभी पितर पितृलोक को छोड़कर पृथ्वी पर आ जाते हैं। यह समय उनके पति बढ़ा अर्पित करने व उनकी परिचर्या करने का अवसर प्रदान करता है। इस वर्ष 26 सितंबर से पितृपक्ष आरंभ हो रहे हैं। पितृपक्ष में पितरों की पूजा का विधान है। वर्ष में देवता व पितरों के पूजन के लिए अलग-अलग समय निर्धारित किए गए हैं। मान्यता है कि पितरों के आशीवाद से ही लौकिक समृद्धि एवं वंश परंपरा की निरंतरता बनी रहती है। अश्विन मास के कृष्ण पक्ष को पितृपक्ष के रूप में जाना जाता है।
ऐसा माना जाता है कि आश्विन मास के कृष्णपक्ष में पितर प्रतिदिन अन्न और जल की आकांक्षा करते हैं। कहीं पितृपक्ष 15 दिनों का और कहीं 16 दिनों का मानते हैं। कहीं पर उल्लेख है कि भाद्रपद शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तथा कुछ ने आश्विन शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को जोड़कर पितृपक्ष के 16 दिन निर्धारित किए हैं। खैर “पूर्णिया से अमावस” तक ज्यादातर यही मानता मानी जाती है। इस अवधि में प्रतिदिन श्राद्ध करने का विधान है। जो नहीं कर सकें, उन्हें पंचमी से लेकर अमावास्या तक श्राद्ध करना चाहिए। जो यह भी न कर सकें, उन्हें अष्टमी से अमावास्या तक तथा जो यह भी न कर सकें उन्हें दशमी से लेकर अमावास्या तक श्राद्ध करना चाहिए। यदि यह भी न हो सके तो केवल अमावास्या को भी श्राद्ध किया जा सकता है। पितृपक्ष में जो व्यक्ति एक दिन भी श्राद्ध करता है, उसके पितर वर्ष भर निश्चित रूप से संतुष्ट रहते है। एक दिन श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को अपने पिता/माता के मृत्यु होने वाली तिथि को श्राद्ध करना चाहिए ।
पिता की पिंड दानादि क्रियाएं पुत्र द्वारा की जानी चाहिए। पुत्र के अभाव में पत्नी, पत्नी के अभाव में भाई भी कर सकता है। इस प्रकार पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, भाई, भाई की संतान, यहां तक की मित्र की संतान भी श्राद्ध करने के अधिकारी हैं।श्राद्ध को अपराह्न में संपन्न करने का विधान है। रात्रि में श्राद्ध करने का निषेध है, संन्यासियों, वानप्रस्थों व वैष्णयों का श्राद्ध द्वादशी को करना चाहिए। याज्ञवलक्य स्मृति कहती है, जिन लोगों की मृत्यु शस्त्रादि के घात से हुई हो, उनका श्राद्ध चतुर्दशी को करना चाहिए। माता के लिए मातृ नवमी को श्राद्ध का विधान है। मान्यता है कि पितृपक्ष में पितर पितृलोक कर पृथ्वी पर आ जाते हैं। यह पितरों की परिचर्या करने का अर्थात प्रशस्त अवसर होता हैं। तर्पण एवं श्राद्ध से तुप्त पितृ धान्य, पुत्र-पौत्रदि का आशीर्वाद देकर पुनः अपने लोक में प्रस्थान कर जाते हैं। वैसे तो कहा गया है श्राद्ध करना ही चाहिए लेकिन अगर किसी कारणवश नहीं कर पाते हैं तो कम से कम रोज गाय को कुत्ते को व कौवे को कुछ ना कुछ खाने के लिए डालना चाहिए। साधारणता सभी परिवारों में दो रोटी इस दिन पितरों के नाम पर रोज सबेरे स्नान करके निकलते ही हैं।
26 सितं. शनि प्रोष्ठपदी/पूर्णिमा श्राद्ध
27 सितं. रवि प्रतिपदा का श्राद्ध
28 सित सोम द्वितीया का श्राद्ध
29 सितं. मंग तृतीया/भरणी का श्राद्ध
30 सित बुध चतुर्थी/पंचमी का श्राद्ध
01 अक्टूबर षष्ठी का श्राद्ध
02 अक्टूबर सप्तमी का श्राद्ध
03 अक्टूबर अष्टमी का श्राद्ध
04 अक्टूबर नवमी का श्राद्ध,/सौभाग्यवतीनां श्राद्ध
5 अक्टूबर सोम दशमी का श्राद्ध
6 अक्टूबर मंगल एकादशी का श्राद्ध
7 अक्टूबर बुध द्वादशी/संन्यासीनां श्राद्ध
8 अक्टूबर गुरु त्रयोदशी का श्राद्ध
9 अक्टूबर शुक्र चतुर्दशी/अपमृत्यु श्राद्ध,चतुर्दशी तिथि को केवल शस्त्र, विष, दुर्घटनादि (अपमृत्यु) से मृतों का श्राद्ध
10 अक्टूबर शनि अमावस, सर्वपितृ, अज्ञात मृत्युतिथि वालों का श्राद्ध।
10 अक्टूबर शनि गजच्छाया योग







