डा० हेडगेवार जी के “एक प्रतिशत व तीन प्रतिशत, का रहस्य

डा० हेडगेवार जी के “एक प्रतिशत व तीन प्रतिशत, का रहस्य

कृष्णानन्द सागर

अंग्रेजों ने जिस तरह हिन्दू समाज को अन्दर से खोखला करने के लिए कांग्रेस की स्थापना की थी, उसी तरह उन्होंने हिन्दू समाज को हमेशा संकट में बनाए रखने के लिए १९०६ में मुस्लिम लीग की भी स्थापना की थी।

मराठा शक्ति ने मुस्लिम सत्ता को प्रायः समाप्त कर दिया था। रही-सही कसर बाद में महाराजा रणजीत सिंह ने पूरी कर दी थी। सत्ता चले जाने पर मुसलमानों में श्रेष्ठता का भाव (Superiority Complex) भी खत्म होना शुरू हो गया था, जिसके परिणामस्वरूप उनके अन्दर की “गुण्डई” में भी कमी आने लग पड़ी और वे धीरे-धीरे हिन्दू समाज के साथ एकरस भी होने शुरू हो गए थे। यदि १००-१५० साल ऐसी ही स्थिति रहती, तो अधिकांश मुसलमान स्वतः ही हिन्दू समाज में विलीन हो जाते। बिल्कुल ऐसे ही जैसे कभी शक, हूण, कुषाण आदि विलीन हो गए थे। किन्तु यह स्थिति अंग्रेज़ों के लिए खतरे की घंटी थी। उन्हें तो चाहिए था मुसलमानों का हिन्दुओं से विलगीकरण ताकि मुसलमान हमेशा हिन्दुओं के सामने तलवार खींचे खड़े रहें। इसी हेतु से उन्होंने मुस्लिम लीग की स्थापना की।

मुसलमानों को हिन्दुओं से अलग रखने की प्रक्रिया में कांग्रेस अंग्रेज़ों के भी एक कदम आगे बढ़ गई और उसने १९१६ में मुस्लिम लीग को सभी भारतीय मुसलमानों की प्रतिनिधि संस्था मान लिया और उससे समझौता करने शुरू कर दिए। गांधी जी ने तो और भी कमाल कर दिया। उन्होंने मुसलमानों द्वारा तुर्किस्तान के खलीफा के समर्थन में किए जा रहे आंदोलन का नेतृत्व स्वयं ही संभाल लिया और पूरी की पूरी कांग्रेस को भी खिलाफत आंदोलन की गोद में बिठा दिया। इससे मुसलमानों में ‘मुस्लिम श्रेष्ठता’ का भाव पुनः आ विराजा, जिसके फलस्वरूप उनके अन्दर की “गुण्डई” राक्षस भी फिर से जाग उठा और उसने १९२९ में केरल के हिन्दुओं पर भीषण कहर ढाया। तब से लेकर प्रति वर्ष देश भर में, कभी कहीं तो कभी कहीं, मुस्लिम दंगों की श्रृंखला ही शुरू हो गई।

कांग्रेस अपने अहिंसा मंत्र के द्वारा हिंदुओं को प्रतिकार न करने का ही उपदेश देती रही। इस प्रकार अंग्रेजों ने जिस उद्देश्य से कांग्रेस व मुस्लिम लीग की स्थापना की थी, दोनों संस्थाएँ अपने कार्यों से उनके उद्देश्य की पूर्ति करती रहीं और अंग्रेज निष्कंटक राज्य करते रहे। भारत माता को दासता की श्रृंखलाओं से मुक्त करने के लिए चाफेकर बन्धु, सावरकर बन्धु, मदनलाल ढींगरा, चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, यतीन्द्रनाथ दास, रासबिहारी बोस, करतार सिंह सराबा आदि जो भी देशभक्त सक्रिय थे-ये दोनों संस्थाएं उनकी निंदा कर उन्हें जनता की नजरों में गिराने की कोशिश करती रहीं। आखिर दोनों ही ब्रिटिश सत्ता की मानस पुत्रियाँ थीं।

डॉ. हेडगेवार जी की मान्यता थी कि भारत हिन्दु राष्ट्र है। जब-जब हिंदू दुर्बल हो गया, तब-तब भारत परतंत्र हुआ। अतः भारत को स्वतंत्र करने के लिए उसी हिन्दू राष्ट्रीयता के भाव को जन-जन के हृदय में पुनः तीव्र रूप से प्रस्थापित करना होगा। ऐसा होने पर हिन्दू समाज एक प्रबल शक्ति बन जाएगा, जिसके द्वारा दिए गए एक ही धक्के से संपूर्ण ब्रिटिश सत्ता धराशायी हो जाएगी। १९२१ में डाक्टर जी जेल में अपने साथियों से चर्चा के दौरान प्रायः कहा करते थे कि पिछले युद्ध (१९१४-१९१८) में जर्मनी इंगलैंड द्वारा हारा जरूर है, लेकिन उसके चरित्र को देखते हुए आगामी २० साल में इंगलैंड से अपनी हार का बदला वह जरूर लेगा। उस समय इंगलैंड फिर से जर्मनी के साथ युद्ध में उलझेगा। वह समय हमारे लिए अपने देश को स्वतंत्र कराने हेतु एक स्वर्णिम अवसर होगा। उस स्वर्णिम अवसर का लाभ उठाने के लिए संगठित हिन्दू शक्ति को खड़ा करना आवश्यक है, ऐसा सोच कर उन्होंने १९२५ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। संघ कार्य की दिशा व संघ-कार्यक्रमों की रचना भी उसी के अनुरूप क्रमशः विकसित की। स्वयंसेवकों के सामने “स्वराज्य” का लक्ष्य स्पष्ट रहे, और उस लक्ष्य के प्रति वे सदैव दृढ़ रहें इसलिए संघ की प्रतिज्ञा में उन्होंने ये शब्द रखे थे-

“मैं हिन्दू राष्ट्र को स्वतंत्र करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूँ।”

यह प्रतिज्ञा प्रत्येक स्वयंसेवक को व्यक्तिशः परम पवित्र भगवा ध्वज के सम्मुख खड़ा करके करायी जाती थी।

डॉक्टर जी का अनुमान ठीक निकला और सितंबर १९३९ में इंगलैंड व जर्मनी में युद्ध शुरू हो गया, जो कि कुछ ही समय में द्वितीय विश्व युद्ध का रूप धारण कर गया। किन्तु तब तक संघ की शक्ति इतनी नहीं बन पायी थी कि वह इस स्थिति का लाभ उठा सके। यह बात डॉक्टर जी को बहुत व्यथित कर रही थी। उन दिनों वे काफी अस्वस्थ भी रहने लगे थे। लेकिन वे हिम्मत हारने वाले भी नहीं थे। उन्होंने १९४० के आरम्भ में ही प्रमुख संघ कार्यकर्ताओं के समक्ष यह बात रखी कि अगले तीन वर्षों के अन्दर जनसंख्या के हिसाब से ग्रामों में १%, तथा नगरों में ३% गणवेशधारी स्वयंसेवक हो जाने चाहिए। इस प्रकार उन्होंने कार्य वृद्धि के लिए १% व ३% का लक्ष्य तो दिया ही, साथ ही इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समय सीमा भी दी-तीन वर्ष।

प्रथम विश्वयुद्ध सवा-चार वर्ष चला था। अब यदि द्वितीय विश्वयुद्ध भी कम से कम चार-पाँच वर्ष तो चलेगा ही, ऐसा अनुमान लगाकर डॉक्टर जी ने १९४२ तक संघ को पर्याप्त सक्षम बना लेने की समय-सीमा तीन वर्ष तय की होगी। ऐसा लगता है कि उन्होंने अपने मस्तिष्क में संघ शक्ति द्वारा ब्रिटिश सत्ता पर अंतिम और निर्णायक प्रहार १९४३ या १९४४ में करने का निश्चित कर लिया था, क्योंकि तब तक अधिकांश अंग्रेज सैनिक यूरोप में ही युद्ध में मारे गए होते और भारत में अपनी सत्ता को बनाये रखने के लिए इंगलैंड से सैनिक भेजना इंगलैंड के लिए सम्भव ही न होता। फलतः देश स्वतंत्र हो जाता। दुर्भाग्य से डॉ. हेडगेवार जी का २१ जून १९४० को देहान्त हो गया।

नूतन सरसंघचालक श्री गुरुजी ने डाक्टर जी द्वारा दिए गए इसी सूत्र को आगे बढ़ाया और तीन वर्ष के अंदर-अंदर कार्य की गति को तीव्र रूप से बढ़ाने के लिए युवा स्वयंसेवकों को पूर्णकालिक कार्यकर्ता (प्रचारक) के रूप में आगे आने हेतु आह्वान करना शुरू किया। देश भर के अपने प्रवास में वे जहाँ भी जाते थे, ऐसा आह्वान करते थे। ६ मार्च १९४२ को श्रीगुरूजी ने नागपुर के कार्यकर्ताओं को अपने उद्बोधन में कहा- “एक निश्चित प्रमाण में काम पूरा करने के लिए हमें जो तीन वर्ष की निश्चित अवधि दी गई थी, जिसमें से दो वर्ष तो अब बीत गए। बाकी बचा है एक वर्ष। मानो तीन घंटे का समय प्रश्न-पत्र हल करने के लिए मिला था, जिसमें से दो घंटे बीत चुके हैं। मानो बाकी जो समय बचा हुआ है, उसी में हमें हमारा निश्चित कार्य पूरा करना ही होगा… एक साल के लिए हम अपने व्यक्तिगत जीवन के सारे दरवाजे बन्द कर दें और असिधारा व्रत ग्रहण करें। एक वर्ष के लिए हम संन्यासी हो जाएँ।”

उसी उद्बोधन में उन्होंने यह भी कहा- “राष्ट्र के इतिहास में शताब्दियों में शायद ही प्राप्त होने वाला महान सुवर्ण अवसर आज हमारे सामने उपस्थित हुआ है।” इस समय अगर हम सोये रहें, तो हमसे बढ़कर अभागा और कौन हो सकता है? संकटमयी परिस्थिति में जो व्यक्ति कार्य करता है, वही अपने मनुष्य होने को सिद्ध करता है। हमारे आदर्श हैं शिवाजी और राणा प्रताप, जिन्होंने भीषण से भीषण संकटों से लोहा लिया था।”

लेखक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के पूर्व प्रचारक व चिंतक है । 

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